


@ लंबे समय से अपनी अद्भुत शिवभक्ति के लिए चर्चित कृष्णा बम की यात्रा भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का केंद्र रही है। अब इन दिनों धनबाद की बुजुर्ग शिवभक्त रेणु देवी की निरंतर साधना भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन की तीसरी सोमवारी… पीठ पर गंगाजल से भरी गगरी, कंठ में बोल-बम का जयघोष और मन में एक ही नाम – बाबा बैद्यनाथ। सुल्तानगंज से देवघर की ओर बढ़ते डाक बमों की भीड़ में इस बार भी एक ऐसी शिवभक्त की कहानी लोगों का ध्यान खींच रही है, जिसके लिए उम्र कभी आस्था के रास्ते में दीवार नहीं बनी।

धनबाद की बुजुर्ग शिवभक्त रेणु देवी पिछले करीब 28 वर्षों से सावन के प्रत्येक सोमवार को सुल्तानगंज से गंगाजल लेकर देवघर पहुंचती हैं और बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करती हैं। वर्ष 1998 में शुरू हुआ उनका यह सिलसिला आज भी उसी श्रद्धा, उसी विश्वास और उसी संकल्प के साथ जारी है।
रेणु देवी के लिए यह यात्रा महज 105 किलोमीटर की पैदल दूरी नहीं है। यह उनके लिए बाबा के प्रति समर्पण का ऐसा संकल्प है, जिसमें थकान पीछे छूट जाती है और भक्ति आगे बढ़ती जाती है। सावन आते ही उनके मन में एक ही भाव जागता है – ‘बाबा का बुलावा आ गया है।’
रेणु देवी की खासियत सिर्फ इतनी नहीं कि वह डाक बम यात्रा करती हैं। उनकी भक्ति का सबसे अद्भुत पक्ष यह है कि 1998 से सावन के प्रत्येक सोमवार को बाबा बैद्यनाथ के दरबार में जलाभिषेक करने का उनका संकल्प लगातार जारी है। सावन की पहली सोमवारी हो या तीसरी, चौथी – उनकी आस्था का सफर नहीं रुकता। समय बदला, रास्ते बदले, परिस्थितियां बदलीं, लेकिन बाबा के प्रति उनकी श्रद्धा नहीं बदली। इसी निरंतरता ने उन्हें धनबाद ही नहीं, बल्कि शिवभक्तों के बीच एक अलग पहचान दी है।
सावन की डाक बम यात्रा की बात हो और शिवभक्ति के अनूठे उदाहरण सामने न आएं, ऐसा संभव नहीं। लंबे समय से अपनी अद्भुत शिवभक्ति के लिए चर्चित कृष्णा बम की यात्रा भी श्रद्धालुओं के लिए प्रेरणा का केंद्र रही है। अब इन दिनों धनबाद की बुजुर्ग शिवभक्त रेणु देवी की निरंतर साधना भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।दोनों की भक्ति की अपनी अलग कहानी है, लेकिन संदेश एक ही है – जब मन में महादेव के प्रति अटूट विश्वास हो, तो उम्र, थकान और कठिन रास्ते भी आस्था के सामने छोटे पड़ जाते हैं।
सुल्तानगंज से देवघर तक की डाक बम यात्रा आसान नहीं होती। पैरों में छाले, शरीर में थकान, मौसम की चुनौती और लगातार चलते रहने की परीक्षा – हर कदम श्रद्धालु की इच्छाशक्ति को परखता है। रेणु बम कहती है – डाक बम यात्रा सिर्फ यात्रा नहीं, तपस्या है। लेकिन डाक बमों के लिए यह कठिनाई भी भक्ति का हिस्सा है। कांवर में गंगाजल और हृदय में बाबा का नाम लेकर वे आगे बढ़ते हैं। रास्ते में मिलने वाला हर बोल-बम, हर हर महादेव का उद्घोष जैसे यात्रियों के भीतर नई ऊर्जा भर देता है।रेणु देवी की कहानी इसी अटूट विश्वास की कहानी है।
1998 से शुरू हुई यह यात्रा अब लगभग तीन दशक की आस्था में बदल चुकी है। इतने वर्षों में न जाने कितनी सोमवारी आईं और चली गईं, कितने सावन बीते, कितनी पीढ़ियां बड़ी हुईं लेकिन रेणु देवी की बाबा के दरबार तक पहुंचने की परंपरा कायम रही।
सावन की तीसरी सोमवारी पर जब सुल्तानगंज से देवघर की ओर डाक बमों का कारवां आगे बढ़ रहा है, तब उस भीड़ में रेणु देवी की वर्षों पुरानी आस्था भी एक संदेश लेकर चल रही है – ‘बाबा का बुलावा हो तो कदम खुद-ब-खुद चल पड़ते हैं… हर हर महादेव!’
















