


@ पांच की हृदयगति रुकने से गई जान। जगह – जगह मेडिकल व्यवस्था के बावजूद हादसों पर नहीं लग रहा विराम।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन की आस्था और बाबा बैद्यनाथ को जल अर्पित करने की इच्छा लेकर कांवड़ यात्रा पर निकले श्रद्धालुओं के लिए बांका का कांवड़िया पथ इस बार कई परिवारों के लिए दर्दनाक याद बन गया है। श्रावणी मेले के शुरुआती 18 दिनों में ही अलग-अलग घटनाओं में आठ कांवड़ियों की मौत हो चुकी है। इनमें सबसे अधिक पांच मौतें हृदयगति रुकने से हुई हैं। वहीं एक कांवड़िये की मौत करंट लगने से, जबकि दो श्रद्धालुओं ने सड़क हादसों में जान गंवाई है।

श्रावणी मेला 30 जुलाई से शुरू हुआ था, जबकि कांवड़ियों की मौत का सिलसिला 1 अगस्त से शुरू हुआ। देखते ही देखते अलग-अलग घटनाओं में आठ श्रद्धालु अपनी जान गंवा चुके हैं। ये सभी श्रद्धालु बाबा की नगरी पहुंचकर जल चढ़ाने की आस्था लेकर अपने घरों से निकले थे, लेकिन मंजिल तक पहुंचने से पहले ही उनकी यात्रा अधूरी रह गई।
आस्था की राह में सबसे बड़ा खतरा बना स्वास्थ्य
कांवड़िया पथ पर हुई मौतों के आंकड़ों पर नजर डालें तो पांच श्रद्धालुओं की मौत हृदयगति रुकने से हुई है। सावन में लंबी दूरी की पैदल यात्रा, लगातार चलना, उमस और गर्मी, शारीरिक थकान तथा भीड़ के बीच यात्रा करना श्रद्धालुओं के लिए चुनौती बन जाता है। हालांकि हर मामले में मौत का सटीक चिकित्सकीय कारण संबंधित मेडिकल जांच से ही स्पष्ट होता है, लेकिन हृदय संबंधी घटनाओं ने यात्रा के दौरान स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ा दी है।
एक कांवड़िये की मौत करंट लगने से हुई, जबकि दो श्रद्धालुओं की जान सड़क दुर्घटनाओं में चली गई। यानी कांवड़िया पथ पर खतरा केवल अत्यधिक थकान या स्वास्थ्य संबंधी परेशानी तक सीमित नहीं है, बल्कि बिजली और यातायात से जुड़े जोखिम भी श्रद्धालुओं के लिए चुनौती बने हुए हैं।
जगह-जगह मेडिकल सुविधा, फिर भी नहीं रुक रही मौत:
श्रावणी मेले को देखते हुए प्रशासन की ओर से कांवड़िया पथ पर जगह-जगह मेडिकल सुविधा और स्वास्थ्य सेवाओं की व्यवस्था की गई है। श्रद्धालुओं की जांच, प्राथमिक उपचार और जरूरत पड़ने पर चिकित्सकीय सहायता उपलब्ध कराने के इंतजाम किए गए हैं। इसके बावजूद मौत की घटनाओं पर पूरी तरह विराम नहीं लग पा रहा है।
यही सवाल अब सबसे अहम है कि जब यात्रा मार्ग पर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध हैं, तो गंभीर स्थिति में पहुंचने वाले श्रद्धालुओं को समय रहते कैसे बेहतर चिकित्सा सहायता मिले और ऐसी घटनाओं को न्यूनतम कैसे किया जाए।
आठ परिवारों की खुशियां मातम में बदलीं:
कांवड़ यात्रा पर निकलते समय इन श्रद्धालुओं के परिवारों ने भी यही उम्मीद की होगी कि वे बाबा बैद्यनाथ को जल चढ़ाकर सकुशल वापस लौटेंगे। लेकिन रास्ते में हुई मौतों ने उनके परिवारों को गहरे सदमे में डाल दिया। जिस यात्रा का उद्देश्य आस्था और मनोकामना की पूर्ति था, वही आठ परिवारों के लिए अपूरणीय क्षति का कारण बन गई।
अब चुनौती सिर्फ भीड़ संभालने की नहीं, जिंदगी बचाने की भी
श्रावणी मेला हर साल लाखों श्रद्धालुओं को आकर्षित करता है। ऐसे में प्रशासन के सामने केवल भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा व्यवस्था की चुनौती नहीं होती, बल्कि लंबी दूरी की पैदल यात्रा कर रहे श्रद्धालुओं की स्वास्थ्य सुरक्षा, बिजली व्यवस्था और सड़क सुरक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
18 दिनों में आठ मौतों का आंकड़ा इस बात की ओर इशारा करता है कि कांवड़िया पथ पर व्यवस्थाओं के साथ-साथ रोकथाम और त्वरित चिकित्सा प्रतिक्रिया को और मजबूत करने की जरूरत है। खासकर हृदय संबंधी आपात स्थिति, अत्यधिक थकान, दुर्घटना और बिजली से जुड़े जोखिमों को लेकर श्रद्धालुओं को लगातार जागरूक करना जरूरी है।
















