


@ गेरुआ वस्त्र, पीठ पर तिरंगा और हाथ में महादेव का ध्वज; समस्तीपुर, मोतिहारी और वैशाली के युवाओं का अनोखा संकल्प – स्केटिंग करते देवघर पहुंचेंगे, बाबा बैद्यनाथ का करेंगे जलाभिषेक।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सावन में बाबा भोलेनाथ की भक्ति के कई रंग देखने को मिलते हैं। कोई नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलता है, कोई कंधे पर कांवर उठाकर निकल पड़ता है तो कोई कठिन तपस्या के साथ बाबा धाम की ओर बढ़ता है। लेकिन इस बार सड़क पर आस्था का अनेक रंग दिखाई दे रहा है, जिसने राहगीरों को भी कुछ पल के लिए अपनी रफ्तार थामने पर मजबूर कर दिया।
गेरुआ कपड़े, पीठ पर तिरंगा, हाथ में भोलेनाथ का ध्वज और पैरों में स्केट्स। करीब दर्जन भर युवाओं की टोली करीब 420 किलोमीटर का सफर स्केटिंग करते हुए तय कर देवघर पहुंचने के संकल्प के साथ निकली है।
ये युवा किसी रेस में शामिल नहीं हैं। न कोई पदक इनके लक्ष्य में है और न ही किसी प्रतियोगिता में जीत। इनके सफर की मंजिल है बाबा बैद्यनाथ धाम, जहां पहुंचकर वे जलाभिषेक करना चाहते हैं।
जब हाइवे बना स्केटिंग ट्रैक:
समस्तीपुर, मोतिहारी और वैशाली के युवाओं की यह टोली इन दिनों जिस रास्ते से गुजर रही है, वहां कुछ देर के लिए लोगों की निगाहें इन पर टिक जा रही हैं। सामान्य तौर पर जिस हाइवे पर गाड़ियां तेज रफ्तार से गुजरती हैं, उसी सड़क पर ये युवा स्केट्स के सहारे आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
गेरुआ वस्त्र और हाथ में लहराता महादेव का ध्वज दूर से ही इस टोली को अलग पहचान देता है। रास्ते में इनके मुंह से निकलता ‘हर-हर महादेव’ का जयघोष माहौल को भक्तिमय बना देता है।
कहीं लोग मोबाइल निकालकर इस अनोखे सफर को कैमरे में कैद करते नजर आते हैं तो कहीं राहगीर कुछ क्षण रुककर इस टोली को देखते हैं।
आस्था के साथ जुनून का सफर:
कांवड़ यात्रा का मतलब सिर्फ एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचना नहीं है। यह श्रद्धा, संकल्प और कठिनाइयों को स्वीकार करने की परंपरा भी है। इन युवाओं ने इसी यात्रा को अपने अंदाज में जीने का फैसला किया है।
करीब 420 किलोमीटर की दूरी स्केट्स पर तय करना अपने आप में चुनौतीपूर्ण है। लगातार सड़क पर संतुलन बनाए रखना, बदलती सड़क परिस्थितियों के बीच आगे बढ़ना और लंबी दूरी तक सफर जारी रखना।इन सबके बीच युवाओं का उत्साह कम होता नहीं दिख रहा।
उनके लिए स्केट्स सिर्फ सफर का साधन नहीं, बल्कि बाबा भोले के प्रति अपने संकल्प को पूरा करने का माध्यम बन गया है।
पीठ पर तिरंगा, हाथ में भोले का ध्वज:
इस यात्रा की तस्वीर में एक और खास रंग नजर आता है। युवाओं की पीठ पर तिरंगा है और हाथों में महादेव का ध्वज। यानी धार्मिक आस्था के साथ देशभक्ति का संदेश भी इस यात्रा का हिस्सा दिखाई दे रहा है। जब यह टोली हाइवे पर एक साथ आगे बढ़ती है तो गेरुआ परिधान, तिरंगा और भगवा ध्वज मिलकर एक अलग ही दृश्य पैदा करते हैं।
रफ्तार के साथ ‘हर-हर महादेव’:
स्केटिंग करते हुए युवाओं की यह टोली सिर्फ सीधे आगे नहीं बढ़ती, बल्कि बीच-बीच में अपने कौशल का प्रदर्शन भी करती नजर आती है। हालांकि हाइवे पर इस तरह की गतिविधियों में सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है, इसलिए यात्रा के दौरान यातायात और सड़क सुरक्षा का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
तेज रफ्तार वाहनों के बीच स्केटिंग करना जोखिम भरा हो सकता है। ऐसे में इस तरह की यात्रा में युवाओं के लिए हेलमेट, सुरक्षा उपकरण, समूह में अनुशासित तरीके से चलना और यातायात नियमों का पालन खास महत्व रखता है।
420 किलोमीटर बाद बाबा धाम में पूरी होगी मन्नत:
सफर अभी लंबा है। सड़क आगे भी है और मंजिल अभी दूर। लेकिन इन युवाओं के चेहरों पर मंजिल तक पहुंचने का उत्साह साफ दिखाई देता है।
उनकी यात्रा का अंतिम पड़ाव देवघर है। वहां पहुंचकर बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करना ही इस पूरे सफर का मकसद है।
कांवड़ यात्रा में हर साल हजारों-लाखों श्रद्धालु अपनी-अपनी आस्था के अनुसार अलग-अलग तरीके अपनाते हैं। कोई पैदल चलता है, कोई दंडवत यात्रा करता है और कोई कठिन व्रत के साथ बाबा धाम पहुंचता है। इस बार इन युवाओं ने स्केट्स को अपनी कांवर यात्रा का पहिया बना दिया है।
420 किलोमीटर की सड़क, पैरों में स्केट्स, कंधे पर आस्था और जुबां पर महादेव का नाम – इन युवाओं की यह यात्रा सिर्फ दूरी तय करने की कहानी नहीं, बल्कि यह बताती है कि भक्ति का रास्ता एक जैसा नहीं होता। मंजिल एक हो तो रास्ते अपने-अपने हो सकते हैं।
















