


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। भागलपुर के पीरपैंती में बाढ़ ने सिर्फ खेत-खलिहान और रास्ते ही नहीं डुबोए हैं, बल्कि सरकारी इंतजामों की पोल भी सतह पर ला दी है। एक तरफ जान जोखिम में डालकर नाव खेने वाले नाविक 300 रुपये रोज में गुजारा करने की पीड़ा सुना रहे हैं, तो दूसरी तरफ बाढ़ राहत शिविर में एक बच्ची ने विधायक के सामने ऐसा सवाल रख दिया कि सरकारी व्यवस्था का पूरा हिसाब-किताब ही सामने आ गया।
जिला परिषद उपाध्यक्ष प्रणव कुमार उर्फ पप्पू यादव ने बाढ़ प्रभावित इलाकों, खासकर चौखंडी धार का दौरा किया। वहां नाविकों ने बताया कि तेज धार, खराब मौसम और लगातार कई घंटे नाव चलाने के बावजूद उन्हें महज 300 रुपये प्रतिदिन मजदूरी मिल रही है। नाविकों की पीड़ा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक नाविक ने कहा – उन्हें ज्यादा कुछ नहीं चाहिए, बस इतना मिले कि पेट भर सके और परिवार भूखा न रहे। हमारा परिवार भी बाढ़ पीड़ित हैं।
नाविकों ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारी नाव सीज करने की धमकी देते हैं। मजबूरी में वे नाव दे देते हैं और फिर जोखिम उठाकर खुद ही लोगों को पार लगाते हैं। यानी बाढ़ में नाव भी उनकी, जोखिम भी उनका और चिंता भी उनकी – बस मजदूरी में सरकारी ‘कंजूसी’ कायम है।

जिप उपाध्यक्ष ने नाविकों की समस्या सुनकर उचित मजदूरी दिलाने के लिए संबंधित अधिकारियों के समक्ष मामला उठाने का भरोसा दिया। अब देखना यह है कि यह भरोसा बाढ़ के पानी की तरह बह जाता है या फिर नाविकों के घर तक कुछ राहत पहुंचती है।
इधर, पीरपैंती में भाजपा विधायक मुरारी पासवान के सामने बाढ़ राहत शिविर की एक बच्ची ने सरकारी व्यवस्था को लेकर ऐसा सवाल दाग दिया, जिसका जवाब शायद किसी सरकारी फाइल में भी आसानी से नहीं मिलेगा। बच्ची ने शिकायत की कि शिविर में किसी दिन खाना बनता है तो किसी दिन नहीं। कल खाना नहीं बना था।
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ। विधायक के साथ खड़े एक व्यक्ति ने बच्ची से आलू छीलने को कहा। बच्ची ने भी बिना लाग-लपेट के जवाब दे दिया – ‘अपनो घर म आलू छीलबै… घरे में खैबै।’ बच्ची की यह दो टूक बात सुनकर मौके पर मौजूद लोग भी चौंक गए।
वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होने के बाद अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या बाढ़ पीड़ितों की शिकायत सुनने के बजाय उन्हें ही व्यवस्था का बोझ उठाने को कहा जाएगा। प्रभावित लोगों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए सामुदायिक रसोई की संख्या में भी उल्लेखनीय वृद्धि की गई है। वर्तमान में जिले में 183 सामुदायिक रसोई संचालित हो रही हैं। पीरपैंती में 22 सामुदायिक रसोई संचालित हैं।
पीरपैंती की तस्वीर फिलहाल कुछ ऐसी बन गई है – नाविक कह रहा है, ‘300 रुपये में पेट नहीं भरता’, और बच्ची पूछ रही है, ‘शिविर में खाना कब बनेगा!’
बाढ़ का पानी उतर जाएगा, लेकिन इन दोनों सवालों का जवाब अगर व्यवस्था ने नहीं दिया तो लोगों के मन में जमा नाराजगी आसानी से उतरने वाली नहीं है। दोनों की मांग बहुत बड़ी नहीं है – एक को मेहनत की मजदूरी चाहिए और दूसरे को दो वक्त का खाना।
तस्वीर साफ है – बाढ़ ने रास्ते जरूर डुबोए हैं, लेकिन सवालों ने सरकारी व्यवस्था की परतें खोल दी हैं।

















