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20 अक्टूबर को महानवमी तथा 21 अक्टूबर को विजयादशमी मानने के समर्थन में प्रस्तुत किए धर्मशास्त्रीय प्रमाण

नवगछिया : शारदीय नवरात्र और विजयादशमी की तिथि को लेकर वर्ष 2026 में अलग-अलग पंचांगों और पूजा-पद्धतियों में अंतर दिखाई दे रहा है। इसी विषय को लेकर पंडित वैदिक ललित शास्त्री ने धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में वर्णित तिथि-निर्णय के आधार पर अपना मत प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार 20 अक्टूबर 2026, मंगलवार को महानवमी तथा 21 अक्टूबर 2026, बुधवार को विजयादशमी मानने का आधार तिथि, सूर्योदयकालीन स्थिति तथा श्रवण नक्षत्र से जुड़े शास्त्रीय विधान में देखा जाना चाहिए।

पंडित ललित शास्त्री ने कृत्यकल्पतरु, कृत्यसारसमुच्चय, नवरात्रप्रदीप, स्मृति-ग्रंथ, धर्मसिन्धु और निर्णयसिन्धु आदि ग्रंथों में वर्णित तिथि-निर्णय के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि धार्मिक अनुष्ठानों के निर्णय में तिथि का विशेष महत्व है। नवरात्रप्रदीप के उपलब्ध पाठ में भी तिथि और नक्षत्र के संबंध में स्पष्ट रूप से तिथि की प्रधानता का उल्लेख मिलता है।

हालांकि, पंचांग-गणना के अनुसार स्थान और पूजा-पद्धति के आधार पर इस विषय में मतभेद भी है। पटना के लिए उपलब्ध गणना में 20 अक्टूबर को सूर्योदय के समय नवमी तथा दोपहर लगभग 12:50 बजे से दशमी प्रारंभ होने के कारण विजयादशमी 20 अक्टूबर को निर्धारित की गई है। वहीं बंगाल की पूजा-पद्धति में 21 अक्टूबर को विजयादशमी का उल्लेख मिलता है।

पंडित वैदिक ललित शास्त्री द्वारा प्रस्तुत शास्त्रीय पक्ष के पांच प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं—

  1. तिथि को प्रधान माना गया है

नवरात्रप्रदीप में तिथि की प्रधानता बताते हुए यह श्लोक उद्धृत है—

“तिथिः शरीरं तिथिरेव कारणं
तिथिः प्रधानं तिथिरेव साधनम्।
नक्षत्रयोगादिषु सैव मुख्या
ग्राह्या न लभ्येत यदा हि ऋक्षम्॥”

अर्थात् तिथि ही धार्मिक कर्म का आधार, कारण, प्रमाण और साधन है। नक्षत्र और योग आदि का भी विचार किया जाता है, लेकिन उनके अभाव में तिथि को ही प्रधान माना गया है।

इसी संदर्भ में नवरात्रप्रदीप में कहा गया है—

“अत्र तिथिनक्षत्रयोगो मुख्यः कल्पः।
वियोगे तु तिथिरेव मुख्या॥”

अर्थात् तिथि और नक्षत्र का संयोग उपलब्ध हो तो वह मुख्य रूप से विचारणीय है, लेकिन दोनों के संयोग के अभाव में तिथि को प्रधान माना गया है। नवरात्रप्रदीप के उपलब्ध मूल पाठ में ये दोनों कथन एक ही प्रसंग में दर्ज हैं।

  1. सूर्योदयकालीन तिथि का विशेष महत्व

विजयादशमी के तिथि-निर्णय में सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि को लेकर भी शास्त्रीय वचन उद्धृत किया गया है—

“सूर्योदये यदा राजन्! दृश्यते दशमी तिथिः।
आश्विने दशमीं शुक्लां विजयां तां विदुर्बुधाः॥”

इसका भावार्थ है कि आश्विन शुक्ल पक्ष में सूर्योदय के समय दशमी तिथि विद्यमान हो तो विद्वान उसे विजयादशमी के रूप में ग्रहण करते हैं।

नवरात्रप्रदीप में कात्यायन-स्मरण के रूप में एक अन्य वचन भी मिलता है—

“उदये दशमी किंचित् सम्पूर्णैकादशी यदि।
श्रवणर्क्षं यथाकालं सा तिथिर्विजयाभिधा॥”

इसका भावार्थ यह है कि सूर्योदय के समय दशमी का कुछ अंश विद्यमान हो, आगे एकादशी पूर्ण हो और उपयुक्त समय में श्रवण नक्षत्र का संयोग हो, तो उस तिथि को विजयादशमी के रूप में माना जाता है।

इसी आधार पर पंडित ललित शास्त्री का कहना है कि विजयादशमी के निर्णय में केवल कैलेंडर की तारीख नहीं, बल्कि उस दिन की तिथि, सूर्योदय और संबंधित कालखंड का शास्त्रीय विचार आवश्यक है।

  1. आश्विन शुक्ल दशमी और पूर्वविद्धा तिथि का विचार

विजयादशमी के संबंध में नवरात्रप्रदीप में ज्योतिर्गर्ग के मत का उल्लेख करते हुए कहा गया है—

“आश्विने दशमीं शुक्लां पूर्वविद्धां न कारयेत्।
एकादश्या युता कार्या राजपट्टाभिषेचने॥”

अर्थात् आश्विन शुक्ल पक्ष की दशमी यदि पूर्वविद्धा हो तो उसे सामान्य रूप से ग्रहण न करने का निर्देश दिया गया है। विशेष कर्मों के संदर्भ में एकादशी से संयुक्त दशमी का भी विधान बताया गया है।

पंडित ललित शास्त्री के अनुसार इस प्रकार के शास्त्रीय वचनों को समझते समय यह देखना आवश्यक है कि दशमी किस समय प्रारंभ हो रही है, सूर्योदय के समय कौन-सी तिथि है तथा संबंधित धार्मिक कर्म किस काल में किया जाना है। इसलिए केवल तिथि के नाम के आधार पर निर्णय करना उचित नहीं है।

  1. विजयादशमी में श्रवण नक्षत्र की भूमिका

विजयादशमी के साथ श्रवण नक्षत्र के संबंध का भी धर्मशास्त्रीय ग्रंथों में उल्लेख मिलता है। नवरात्रप्रदीप में देवी-पूजन एवं विसर्जन के क्रम में कहा गया है—

“मूलेनावाहयेद्देवीं पूर्णेन प्रतिपूजयेत्।
उत्तरेणाऽर्चनं कृत्वा श्रवणेन विसर्जयेत्॥”

अर्थात् मूल नक्षत्र में देवी का आवाहन, पूर्वाषाढ़ा में पूजन, उत्तराषाढ़ा में बलि तथा श्रवण नक्षत्र में विसर्जन का विधान बताया गया है।

इसी ग्रंथ में आगे धवलनिबंध का मत उद्धृत करते हुए कहा गया है—

“मूलेनाऽऽगमनं देव्यः पूर्वाषाढासु पूजनम्।
उत्तरासु बलिं दद्याच्छ्रवणेन विसर्जयेत्॥”

इससे स्पष्ट होता है कि शारदीय दुर्गापूजा की तिथि-व्यवस्था में नक्षत्रों का भी विशिष्ट स्थान है। हालांकि उसी प्रसंग में ग्रंथ यह भी स्पष्ट करता है कि तिथि और नक्षत्र के संयोग के अभाव में तिथि को प्रधान माना जाता है।

  1. निष्कर्ष : तिथि प्रधान, नक्षत्र का भी शास्त्रीय महत्व

पंडित वैदिक ललित शास्त्री ने अपने मत का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि धार्मिक कर्मों के निर्णय में तिथि को मूल आधार माना गया है। नक्षत्र का महत्व भी शास्त्रों में स्वीकार किया गया है, लेकिन तिथि के स्थान को गौण नहीं किया जा सकता।

नवरात्रप्रदीप में उद्धृत वचन—

“तिथिः शरीरं तिथिरेव कारणं
तिथिः प्रधानं तिथिरेव साधनम्।”

तिथि की प्रधानता को स्पष्ट करता है। साथ ही उसी ग्रंथ में देवी के विसर्जन के लिए श्रवण नक्षत्र का विधान भी मिलता है। इस प्रकार तिथि और नक्षत्र दोनों का अपना-अपना महत्व है, लेकिन इनके प्रयोग और प्राथमिकता का निर्धारण संबंधित धार्मिक कर्म एवं शास्त्रीय विधान के अनुसार किया जाना चाहिए।

2026 में 20 और 21 अक्टूबर को लेकर क्या है स्थिति?

वर्ष 2026 में आश्विन शुक्ल नवमी 20 अक्टूबर को दोपहर लगभग 12:50 बजे तक है और इसके बाद दशमी प्रारंभ होती है। दशमी 21 अक्टूबर को लगभग 2:11 बजे तक रहती है। इसी कारण तिथि लगातार दो नागरिक तिथियों में फैली हुई है।

पटना के लिए उपलब्ध पंचांग-गणना में 20 अक्टूबर को विजयादशमी निर्धारित की गई है, क्योंकि उस दिन अपराह्न काल में दशमी विद्यमान रहती है। वहीं उसी गणना में 21 अक्टूबर को ‘बंगाल विजयादशमी’ अलग से दर्ज है।

इसी तिथि-विस्तार और अलग-अलग पूजा-पद्धतियों के कारण 20 अक्टूबर को महानवमी तथा 21 अक्टूबर को विजयादशमी मानने के पक्ष में भी शास्त्रीय मत प्रस्तुत किया जा रहा है। पंडित वैदिक ललित शास्त्री का मत इसी आधार पर है। उनका कहना है कि तिथि-निर्णय करते समय केवल सामान्य प्रचलन के बजाय संबंधित शास्त्रीय वचनों, सूर्योदयकालीन तिथि, अपराह्नकाल और नक्षत्र की स्थिति का सम्यक् विचार किया जाना चाहिए।

पंडित वैदिक ललित शास्त्री ने कहा कि तिथि-निर्णय का विषय शास्त्रीय है और इसमें विभिन्न परंपराओं के अनुसार मतभेद संभव हैं। इसलिए श्रद्धालुओं को अपने क्षेत्र की परंपरा तथा मान्य पंचांग के अनुसार पूजा-विधान का पालन करना चाहिए।

— पंडित वैदिक ललित शास्त्री ।

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