


@ 2018 की सूचना पर 2026 में आयोग की सुनवाई, अधिकारी ने कहा – आवेदक फिर से बताए क्या चाहिए।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सूचना का अधिकार (RTI) कानून का उद्देश्य सरकारी सूचनाएं समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराना है, लेकिन भागलपुर के एक मामले ने इस व्यवस्था की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भागलपुर के आरटीआई कार्यकर्ता अजित कुमार सिंह द्वारा वर्ष 2018 में दायर एक आरटीआई आवेदन की सुनवाई आठ वर्ष बाद राज्य सूचना आयोग तक पहुंची और अब संबंधित अधिकारी की ओर से यह कहा गया है कि इतने लंबे समय बाद यह स्पष्ट नहीं है कि आवेदक ने कौन-सी सूचना मांगी थी।
मामला सदर अस्पताल, भागलपुर के पोषण पुनर्वास केंद्र (Nutrition Rehabilitation Centre) से जुड़ा है। आवेदक अजीत कुमार सिंह ने 23 मार्च 2018 को सूचना मांगी थी। नियमानुसार 30 दिनों के भीतर जवाब दिया जाना था, लेकिन मामला वर्षों तक लंबित रहा।
30 जून 2026 को राज्य सूचना आयोग में सुनवाई तय हुई। आरोप है कि उस दिन लोक सूचना पदाधिकारी (PIO) एवं सिविल सर्जन उपस्थित नहीं हुए। आयोग ने अनुपस्थिति पर नाराजगी जताते हुए टिप्पणी की कि इससे आयोग का समय नष्ट हो रहा है तथा आवेदक को मानसिक और आर्थिक परेशानी उठानी पड़ रही है। इसके बाद आयोग ने अगली सुनवाई के लिए 6 अगस्त 2026 की तिथि निर्धारित करते हुए अंतिम अवसर दिया।
इसी बीच 30 जुलाई 2026 को सिविल सर्जन की ओर से आयोग को भेजे गए पत्र ने पूरे मामले को नई चर्चा में ला दिया। पत्र में कहा गया कि आवेदन काफी पुराना होने के कारण यह स्पष्ट नहीं हो पा रहा है कि आवेदक ने कौन-सी सूचना मांगी थी। आयोग से अनुरोध किया गया कि आवेदक से फिर से यह स्पष्ट कराने का निर्देश दिया जाए कि उसे कौन-सी जानकारी चाहिए।
इस पत्र के सामने आने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं। यदि आरटीआई आवेदन और उससे संबंधित अभिलेख विभाग के रिकॉर्ड में सुरक्षित थे, तो सूचना की प्रकृति स्पष्ट क्यों नहीं रही? वहीं यदि रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं हैं, तो उनकी जवाबदेही किसकी होगी? यह भी सवाल है कि आठ वर्षों तक लंबित रहे मामले में अब आवेदक से दोबारा सूचना का विवरण मांगना आरटीआई कानून की मूल भावना के अनुरूप है या नहीं।
अब सभी की नजर 6 अगस्त 2026 को प्रस्तावित सुनवाई पर है, जहां यह स्पष्ट हो सकेगा कि आयोग इस मामले में क्या रुख अपनाता है और आठ वर्षों से लंबित सूचना आखिरकार आवेदक को मिल पाती है या नहीं।

















