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@ टीएमबीयू में अगस्त की पेंशन पर फिर संकट के बादल। पेंशनर संघर्ष मंच ने कहा विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा।

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। एक तरफ विश्वविद्यालय के खाते में करोड़ों रुपये की एफडी, दूसरी तरफ अपने ही हक की पेंशन के लिए इंतजार करते बुजुर्ग पेंशनर। तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय (टीएमबीयू) में अगस्त माह की पेंशन को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं। पेंशनर संघर्ष मंच ने विश्वविद्यालय प्रशासन पर निशाना साधते हुए कहा है कि जब करोड़ों रुपये की राशि एफडी के रूप में मौजूद है, तो आखिर पेंशनरों को उनके अगस्त माह की पेंशन देने में परेशानी क्यों हो रही है!


मंच के संयोजक प्रो. पवन कुमार सिंह ने कहा कि राज्य के अन्य विश्वविद्यालयों के अगस्त माह के वेतन और पेंशन की राशि सरकार द्वारा विमुक्त कर दी गई है और भुगतान भी हो रहा है। लेकिन टीएमबीयू के पेंशनरों के मामले में एक बार फिर पेंशन रोक दी गई है। पेंशनर संघर्ष मंच का आरोप है कि पिछले तीन वित्तीय वर्षों से हिसाब-किताब में गड़बड़ी को लेकर राज्य सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के बीच चल रही रस्साकशी का सबसे बड़ा खामियाजा उन वरिष्ठ नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है, जिन्होंने अपनी जिंदगी विश्वविद्यालय की सेवा में लगा दी।मंच के मुताबिक, सेवांत लाभ के लिए प्राप्त अनुदान को निर्धारित तरीके से लाभार्थियों में वितरित करने के बजाय पिछले करीब डेढ़ दशक से राशि को एफडी में रखने की परंपरा चली आ रही थी। एक समय यह राशि बढ़कर 377.85 करोड़ रुपये तक पहुंच गई।
मंच का कहना है कि शिक्षा विभाग के तत्कालीन अपर मुख्य सचिव केके पाठक के हस्तक्षेप के बाद इस व्यवस्था पर सवाल उठे और विश्वविद्यालय पर राशि सरकार को वापस करने का दबाव बनाया गया। इसके बाद विभिन्न किस्तों में करीब 250 करोड़ रुपये सरकार को लौटाए गए। शेष राशि की भी मांग सरकार द्वारा की जा रही है।
मंच ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि जिम्मेदार लोगों को वेतन मिलता रहे और जिन बुजुर्गों का इसमें कोई दोष नहीं है, उनकी पेंशन रोक दी जाए – यह किसी भी दृष्टि से न्यायसंगत नहीं है।


टीएमबीयू पेंशनर संघर्ष मंच ने कुलपति से स्पष्ट मांग की है कि विश्वविद्यालय उपलब्ध फिक्स्ड डिपॉजिट में से आवश्यक राशि निकालकर अगस्त माह की पेंशन का भुगतान तत्काल सुनिश्चित करे। मंच ने चेतावनी दी है कि यदि पेंशन का भुगतान नहीं किया गया तो विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ चरणबद्ध आंदोलन शुरू किया जाएगा।

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