


@ भागलपुर में जलमग्न हुआ श्मशान घाट, सुल्तानगंज बना टापू; कहलगांव में भी पानी ने निगल ली पूरी श्मशान भूमि।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। भागलपुर में गंगा का उफान अब सिर्फ घरों, खेतों और सड़कों तक सीमित नहीं रह गया है। बाढ़ ने इंसान की अंतिम विदाई की जगह तक छीन ली है। बरारी श्मशान घाट पानी में डूब चुका है और मजबूरी में सड़क किनारे ऊंची जगहों पर चिताएं सज रही हैं।
जहां कभी अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां सजती थीं और परिजन अपनों को अंतिम विदाई देते थे, वहां अब पानी पसरा है। श्मशान घाट का बड़ा हिस्सा और शेड जलमग्न हैं। ऐसे में शव लेकर पहुंचने वाले परिजनों को सड़क किनारे कोई ऊंची और अपेक्षाकृत सुरक्षित जगह तलाशनी पड़ रही है।
एक तरफ गंगा का बढ़ता पानी, दूसरी तरफ सड़क पर जलती चिता और बीच में जिंदगी की भागदौड़—भागलपुर में बाढ़ की यह तस्वीर व्यवस्था की एक ऐसी मजबूरी सामने ला रही है, जिसे देखकर मन विचलित हो उठता है।
गीली लकड़ियां, पानी और कीचड़… अंतिम विदाई भी बनी परीक्षा:
बारिश और बाढ़ के बीच अंतिम संस्कार की प्रक्रिया आसान नहीं रह गई है। गीली लकड़ियों से चिता जलाना मुश्किल हो रहा है। शव लेकर पहुंचने से लेकर लकड़ी जुटाने, चिता सजाने और अंतिम संस्कार की रस्में पूरी करने तक परिजनों को पानी, कीचड़ और यातायात के बीच जूझना पड़ रहा है।
अमरपुर से चिता जलाने पहुंचे दिलीप बताते हैं कि सूखी लकड़ी मिलना भी अब चुनौती बन गया है। सामान्य दिनों में श्मशान के आसपास लकड़ी और अंतिम संस्कार की सामग्री आसानी से मिल जाती थी, लेकिन बाढ़ ने पूरी व्यवस्था बदल दी है।

सड़क पर चिता, धुएं के बीच गुजर रहे राहगीर:
बरारी में सड़क किनारे अंतिम संस्कार होने का असर राहगीरों और आसपास के लोगों पर भी पड़ रहा है। सड़क से गुजरने वाले लोगों को चिता के धुएं के बीच से निकलना पड़ रहा है। लेकिन इन दृश्यों के पीछे सबसे बड़ी पीड़ा उन परिवारों की है, जिन्हें बाढ़ की इस विकट परिस्थिति में भी अपने प्रियजन को अंतिम विदाई देनी है।
ग्रामीण इलाके से आए बंशीधर उपाध्याय कहते हैं कि बाढ़ के बीच लकड़ी खरीदने से लेकर चिता जलाने तक हर कदम पर परेशानी है। पानी और कीचड़ के बीच किसी तरह धार्मिक प्रक्रिया पूरी करनी पड़ रही है। क्योंकि मृत्यु किसी बाढ़ का इंतजार नहीं करती और अंतिम संस्कार टाला नहीं जा सकता।
सुल्तानगंज का श्मशान बना टापू:
गंगा के बढ़ते जलस्तर का असर सुल्तानगंज के श्मशान घाट पर भी साफ दिखाई दे रहा है। घाट चारों तरफ से पानी से घिर गया है। पहुंचने वाले रास्ते और आसपास के इलाके जलमग्न हैं। हालात ऐसे हैं कि पूरा श्मशान घाट टापू जैसा नजर आ रहा है।
शव लेकर आने वाले परिजनों को पानी और कीचड़ के बीच रास्ता तलाशना पड़ रहा है। जलस्तर और बढ़ा तो शवों को नाव या अन्य साधनों से ऊंची जगह तक ले जाने की नौबत आ सकती है। इससे पहले से संकट में घिरे परिवारों पर अंतिम संस्कार का अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ सकता है।
कहलगांव में भी पानी ने निगली श्मशान भूमि:
कहलगांव में भी हालात कम भयावह नहीं हैं। यहां गंगा का पानी पूरी श्मशान भूमि में फैल गया है। खास बात यह है कि इस श्मशान घाट पर झारखंड के गोड्डा से भी बड़ी संख्या में लोग अंतिम संस्कार के लिए पहुंचते हैं। अब पानी के बीच अंतिम संस्कार की व्यवस्था करना परिजनों के साथ-साथ स्थानीय प्रशासन के लिए भी बड़ी चुनौती बन गया है।
बाढ़ की सबसे मार्मिक तस्वीर:
बाढ़ में घर डूबने की तस्वीरें दिखती हैं, खेतों में पानी भरने की खबरें आती हैं, सड़कें जलमग्न होने की चर्चा होती है और राहत-बचाव के इंतजाम किए जाते हैं। लेकिन जब श्मशान घाट डूब जाता है, तब संकट सिर्फ एक जगह के डूबने का नहीं होता। यह उस व्यवस्था के डूबने की तस्वीर होती है, जहां इंसान अपने प्रियजन को आखिरी बार विदा करता है।
जिंदा लोगों के लिए राहत और बचाव जरूरी है। मगर बाढ़ के बीच प्रशासन के सामने एक और सवाल खड़ा हो गया है – जब अंतिम विदाई की जगह ही पानी में डूब जाए, तब मृतकों को सम्मानजनक विदाई कैसे मिले? उठती चिताएं आज सिर्फ धुआं नहीं छोड़ रहीं। वे व्यवस्था से एक खामोश सवाल भी पूछ रही हैं – क्या बाढ़ के बीच अंतिम संस्कार के लिए भी कोई सुरक्षित जगह नहीं बची?

















