


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बिहार में धान, गेहूं, मक्का, दलहन, तिलहन और लहसुन की 15 नई फसल किस्मों की सिफारिश की गई है। कृषि विभाग के तहत गठित राज्य किस्म विमोचन समिति (SVRC) की सिफारिशों में बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU), सबौर, भागलपुर द्वारा विकसित 11 किस्में शामिल हैं। शेष चार किस्मों में दो का योगदान राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RPCAU), पूसा और दो का आईसीएआर-रिसर्च कॉम्प्लेक्स फॉर ईस्टर्न रीजन (ICAR-RCER), पटना का है।
BAU के कुलपति डॉ. डीआर सिंह के अनुसार, इन किस्मों की सिफारिश वैज्ञानिक अनुसंधान, फसल परीक्षण और मूल्यांकन की प्रक्रिया के बाद की गई है। उन्होंने कहा कि नई किस्मों के विकास में बिहार की कृषि परिस्थितियों और किसानों के सामने आने वाली विभिन्न समस्याओं को ध्यान में रखा गया है।

इनमें जलभराव, देर से बुआई, रोग प्रकोप, तापमान में उतार-चढ़ाव, उत्पादकता, अनाज की गुणवत्ता और भंडारण से जुड़े पहलुओं पर विशेष ध्यान दिया गया है।
BAU की 11 किस्मों में छह फसलों की किस्में:
BAU की ओर से विकसित 11 किस्मों में तीन धान, तीन गेहूं, एक मक्का, दो दलहन, एक तिलहन और एक लहसुन की किस्म शामिल है। धान की तीन किस्मों को सिंचित और मध्यम अवधि वाली खेती, जलभराव वाली परिस्थितियों तथा सुगंधित धान की खेती के लिए उपयुक्त बताया गया है। गेहूं की तीन किस्मों में समय पर और देर से बुआई दोनों परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है। इनमें रतुआ जैसे रोगों के प्रति प्रतिरोध की विशेषता भी बताई गई है।
दो दलहन किस्मों में उत्पादकता और उकठा रोग के प्रति प्रतिरोध पर जोर दिया गया है। वहीं तिलहन की एक किस्म में बेहतर उपज और तेल की मात्रा के साथ देर से बुआई की स्थिति में उपयोगिता को ध्यान में रखा गया है। लहसुन की नई किस्म को उच्च उत्पादकता और लंबे समय तक भंडारण क्षमता के लिए सिफारिश की गई है।
बिहार की कृषि परिस्थितियों पर फोकस:
डॉ. सिंह ने कहा कि बिहार में फसल उत्पादन पर बुआई का समय, मिट्टी में नमी, तापमान में बदलाव और रोगों का दबाव जैसे कारकों का प्रभाव पड़ता है। राज्य के विभिन्न कृषि-जलवायु क्षेत्रों में परिस्थितियां भी अलग-अलग हैं। ऐसे में फसल किस्मों के विकास में इन स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है। नई किस्मों में अलग-अलग उत्पादन परिस्थितियों के लिए विकल्प उपलब्ध कराने पर जोर दिया गया है। इनमें देर से बुआई और जलभराव जैसी स्थितियों के लिए विकसित किस्में भी शामिल हैं।
किसानों तक पहुंचाने की अगली चुनौती:
BAU कुलपति ने विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों, पौधा प्रजनकों और शोध टीमों को नई किस्मों के विकास के लिए बधाई दी। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक अनुसंधान का उद्देश्य उसकी उपलब्धियों को खेती में उपयोगी बनाना है।
अब इन सिफारिशों के बाद संबंधित किस्मों का प्रमाणीकरण, बीज उत्पादन और किसानों तक उपलब्धता महत्वपूर्ण चरण होंगे। इन प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही नई किस्मों का व्यापक स्तर पर खेती में उपयोग संभव होगा।

















