


प्राकृतिक झूरी से लेकर कृत्रिम पोखर तक सजाया पूजा स्थल, पारंपरिक गीतों और अनुष्ठानों से भक्तिमय रहा माहौल
मुरलीधर झा
नवगछिया के गोपालपुर प्रखंड के विभिन्न क्षेत्रों में मंगलवार को भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और स्नेह का प्रतीक कर्मा-धर्मा पर्व श्रद्धा और पारंपरिक विधि-विधान के साथ मनाया गया। पर्व को लेकर सुबह से ही गांवों और टोले-मोहल्लों में उत्साह का माहौल रहा। बालिकाओं और महिलाओं के समूह लोकगीत गाते हुए प्राकृतिक झूरी लेकर पूजा स्थल तक पहुंचे। इस दौरान पारंपरिक गीतों की गूंज से ग्रामीण क्षेत्रों का वातावरण उत्सवमय बना रहा।

पूजा की तैयारियों को लेकर महिलाओं और बालिकाओं में विशेष उत्साह देखा गया। कई स्थानों पर सुविधा के अनुसार कृत्रिम पोखर तैयार किया गया। पूजा स्थल को केले के तने, खजूर के पत्तों और अन्य प्राकृतिक सामग्री से आकर्षक ढंग से सजाया गया। ग्रामीण क्षेत्रों में पारंपरिक तरीके से बनाए गए पूजा स्थलों पर दिनभर तैयारियां चलती रहीं।

शाम के समय बहनों ने नए वस्त्र धारण कर विधि-विधान के साथ कर्मा-धर्मा की पूजा-अर्चना की। पूजा के दौरान विभिन्न देवी-देवताओं की आराधना की गई। इसके बाद कर्मा-धर्मा से जुड़ी पारंपरिक कथा सुनी गई। कथा और पूजा के बाद भाई-बहन के प्रेम, सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना करते हुए परंपरागत अनुष्ठान किए गए।
पारंपरिक मान्यता के अनुसार कर्मा-धर्मा पर्व भाई-बहन के पवित्र रिश्ते, आपसी प्रेम और स्नेह से जुड़ा पर्व है। इस अवसर पर बहनें उपवास रखकर अपने भाइयों के सुख, समृद्धि और लंबी आयु की कामना करती हैं। वहीं भाई भी बहनों के प्रति अपने स्नेह और जिम्मेदारी का भाव प्रकट करते हैं। पर्व के दौरान लोक परंपराओं और रीति-रिवाजों का विशेष महत्व रहता है।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाने की परंपरा
स्थानीय मान्यता और परंपरा के अनुसार कर्मा-धर्मा पर्व प्रत्येक वर्ष भाद्रपद शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को मनाया जाता है। पर्व को लेकर गांवों में कई दिनों पहले से तैयारियां शुरू हो जाती हैं। महिलाएं और बालिकाएं समूह बनाकर पूजा की सामग्री तैयार करती हैं और पारंपरिक लोकगीतों के साथ पूजा स्थल तक पहुंचती हैं।
संध्या के समय विभिन्न स्थानों पर बालिकाओं और महिलाओं द्वारा सजाए गए कृत्रिम नाव घाट विशेष आकर्षण का केंद्र बने रहे। पूजा स्थलों पर लोगों की आवाजाही बनी रही। लोकगीतों, पूजा-पाठ और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के कारण पूरे क्षेत्र का वातावरण भक्तिमय रहा।
ग्रामीण क्षेत्रों में पर्व की पारंपरिक छटा देखते ही बनी। नई पीढ़ी की बालिकाओं और महिलाओं ने भी उत्साह के साथ पर्व में भाग लेकर लोक परंपरा को आगे बढ़ाने का संदेश दिया। देर शाम तक विभिन्न पूजा स्थलों पर धार्मिक अनुष्ठान और लोकगीतों का सिलसिला चलता रहा।
















