
जिले के घोघा नदी में पनछेकों और बांधों से निकासी बाधित होने का आरोप, कहलगांव-सबौर-गोराडीह के किसान बेहाल; आखिर कब जागेगा प्रशासन।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर।किसानों की बदहाली, प्रशासनिक उदासीनता और खेती पर गहराते संकट की यह तस्वीर बेहद गंभीर है। भागलपुर जिले के कहलगांव, सबौर और गोराडीह प्रखंडों में हजारों एकड़ कृषि भूमि पिछले करीब छह वर्षों से जलजमाव की समस्या से जूझ रही है। खेतों में पानी जमा रहने के कारण किसान समय पर रबी फसल की बुआई नहीं कर पा रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि इस बार भी हजारों एकड़ खेतों में बुआई नहीं होने का खतरा मंडरा रहा है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब समस्या के समाधान के लिए तत्कालीन प्रमंडलीय आयुक्त ने 16 जनवरी 2023 को आदेश पारित किया था, तो अब तक उसका प्रभावी अनुपालन क्यों नहीं हुआ? किसान बताते हैं इस उपजाऊ भूमि में चना, मसूर, मकई, खेसाड़ी, गेंहू, सरसों, मटर की भरपूर खेती होती है।

कहलगांव के शंकरपुर कोदवार, सबौर के रसलपुर, डाटपुर, ताल शहादत, ताल मुबारक, ताल बडेर और खालदासपुर तथा गोराडीह के दादपुर एवं गोहारियो सहित आसपास के इलाकों की हजारों एकड़ जमीन जलजमाव से प्रभावित बताई जा रही है। खेतों में पानी जमा रहने से खेती का चक्र बिगड़ गया है और किसान मुख्य रूप से एक रबी फसल पर निर्भर होने को मजबूर हैं।
खेती पर निर्भर हजारों परिवारों की आर्थिक स्थिति लगातार बिगड़ रही है। किसानों का कहना है कि जब खेतों में फसल ही नहीं होगी, तो परिवार का भरण-पोषण कैसे होगा? रोजगार की तलाश में कई परिवारों के पलायन की नौबत आ गई है। सवाल साफ है – जिस जमीन से किसानों का पेट पलता था, वही जमीन अब उनके लिए परेशानी का सबब क्यों बनी हुई है।
प्रभावित किसानों के अनुसार, चानन नदी से आने वाला पानी कटारिया नदी के रास्ते राष्ट्रीय राजमार्ग-80 के समानांतर बहने वाली घोघा नदी तक पहुंचता है। किसानों का आरोप है कि घोघा नदी में ईंट-भट्ठा संचालकों द्वारा अलग-अलग स्थानों पर करीब 50 पनछेकों और बांधों का निर्माण किए जाने से पानी की प्राकृतिक निकासी बाधित हो रही है।इसका असर सहायक लहुरी नदी और आसपास के चौर क्षेत्रों पर भी पड़ रहा है। पानी खेतों में फैलकर लंबे समय तक जमा रहता है, जिससे उपजाऊ कृषि भूमि पर खेती करना मुश्किल हो गया है।
किसानों के मुताबिक, बार-बार अधिकारियों के समक्ष गुहार लगाने के बावजूद समस्या का समाधान नहीं हुआ। इसके बाद वर्ष 2022 में पटना हाईकोर्ट में C.W.J.C. No. 6159/2022 के तहत याचिका दायर की गई। मामले में पारित आदेश के आलोक में किसानों के अभ्यावेदन पर कार्रवाई की प्रक्रिया चली और तत्कालीन भागलपुर प्रमंडलीय आयुक्त ने 16 जनवरी 2023 को आदेश पारित किया।
किसानों के अनुसार, उक्त आदेश में विशेष व्यवस्था वाले पांच स्थानों को छोड़कर घोघा नदी में ईंट-भट्ठा संचालकों द्वारा पनछेकों और बांधों के निर्माण पर रोक लगाने संबंधी निर्देश दिए गए थे। लेकिन किसानों का दावा है कि आदेश के बावजूद नदी में फिर से पनछेकों और बांधों का निर्माण हुआ तथा जलजमाव की समस्या जस की तस बनी हुई है।जब आदेश जारी हो चुका है, तो उसका जमीन पर असर क्यों नहीं दिख रहा?यही सवाल अब प्रभावित किसान प्रशासन से पूछ रहे हैं।
किसानों का कहना है कि वर्ष 2024 और 2025 में भी प्रमंडलीय आयुक्त तथा जिलाधिकारी, भागलपुर को आवेदन देकर समस्या से अवगत कराया गया। इसके बावजूद जलनिकासी की स्थायी व्यवस्था नहीं हो सकी। अब एक बार फिर किसानों ने मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग उठाई है।
किसानों की मांग है कि घोघा नदी और संबंधित जलनिकासी मार्गों की स्थलीय जांच कराई जाए। जलनिकासी में बाधा डालने वाले अवैध पनछेकों और बांधों को नियमानुसार हटाया जाए। साथ ही, प्रभावित खेतों से पानी निकालने की स्थायी व्यवस्था की जाए।
















