
‘एक दीया अंगिका के नाम’ कार्यक्रम में भाषा और संस्कृति के संरक्षण का संकल्प, अंगिका को अलग भाषा कोड दिलाने के लिए बिहार सरकार से पहल की मांग
भागलपुर। अंगिका भाषा की पहचान, सम्मान और संवैधानिक स्तर पर मान्यता की दिशा में जनजागरण की पहल तेज हो गई है। अंग क्षेत्र के साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों, पत्रकारों और समाजसेवियों ने आम लोगों से अपील की है कि आगामी जनगणना में अपनी मातृभाषा के रूप में अंगिका अवश्य दर्ज कराएं। वक्ताओं ने कहा कि अपनी मातृभाषा की पहचान को मजबूत बनाने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है।

बुधवार को सामाजिक संस्था युग चेतना फाउंडेशन की ओर से एक स्थानीय होटल में ‘एक दीया अंगिका के नाम’ शीर्षक से संकल्प संगीत संध्या आयोजित की गई। यह कार्यक्रम दिवंगत अंगिका साहित्यकारों की स्मृति और भाषा-संस्कृति से जुड़े मौलिक अधिकारों के प्रति जागरूकता को समर्पित रहा। कार्यक्रम में उपस्थित लोगों ने दीप प्रज्वलित कर अंगिका भाषा के संरक्षण और संवर्धन का संकल्प लिया। साथ ही दीपावली के अवसर पर प्रत्येक घर में अंगिका के नाम एक दीया जलाने की अपील की गई।
अंगिका को अलग भाषा कोड दिलाने की मांग
कार्यक्रम में वक्ताओं ने बिहार सरकार से अंगिका को अलग भाषा कोड दिलाने के लिए आवश्यक पहल करने की मांग की। युग चेतना फाउंडेशन के निदेशक शिवनंदन खेतान ने कहा कि भाषा किसी जाति या धर्म की नहीं, बल्कि पूरे समाज की पहचान होती है। अंगिका के विकास और सम्मान के लिए जाति, धर्म और वर्ग से ऊपर उठकर सभी लोगों को एकजुट होना होगा।
उन्होंने कहा कि जनगणना में मातृभाषा के रूप में अंगिका दर्ज कराने से इसकी पहचान और भाषाई आंकड़ों को मजबूती मिलेगी। इसलिए लोगों को इस दिशा में जागरूक करना समय की आवश्यकता है।
अंगिका साहित्य और लोकगीतों ने बांधा समां

कार्यक्रम के दौरान वरिष्ठ लेखिका डॉ. आभा पूर्वे द्वारा अंगिका में रचित बाल लघु उपन्यास ‘वापसी’ और बाल एकांकी ‘वंदे मातरम’ का लोकार्पण किया गया। दोनों साहित्यिक कृतियों को अंगिका साहित्य के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण पहल के रूप में प्रस्तुत किया गया।
वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कार्यक्रम का संचालन किया। डॉ. मनजीत सिंह किनवार ने अंगिका कविताओं का पाठ कर श्रोताओं को साहित्यिक आनंद दिया। वहीं, अंग कोकिला एवं लोक गायिका अर्पिता चौधरी ने अपनी अंगिका लोकगीतों की प्रस्तुति से समां बांध दिया। उनकी प्रस्तुतियों ने कार्यक्रम में लोकसंस्कृति की जीवंत छटा बिखेर दी।
साहित्यकारों और समाजसेवियों की रही भागीदारी
कार्यक्रम में डॉ. शंभु दयाल खेतान, डॉ. डी.पी. सिंह, अंशु सिंह, राम रतन चूड़ीवाला, डॉ. अमरेंद्र, कमल जायसवाल, डॉ. मनोज मीता, प्रकाश चंद्र गुप्ता, सत्य नारायण मंडल, प्रेम प्रकाश मंडल, जयंत जलद, डॉ. श्वेता भारती, शेखर खागड़ी और मनीष आर्यन सहित बड़ी संख्या में साहित्यकार, कलाकार, बुद्धिजीवी एवं समाजसेवी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के माध्यम से अंगिका भाषा को घर-घर तक पहुंचाने, नई पीढ़ी को अपनी मातृभाषा से जोड़ने और इसके साहित्यिक एवं सांस्कृतिक वैभव को संरक्षित करने का संदेश दिया गया।















