
@ पूर्णिया, कटिहार, खगड़िया और सीमांचल की मंडियों में मक्के की कीमतों में जोरदार तेजी के संकेत। बेहतर गुणवत्ता वाले मक्के की कीमत 3000 रुपये के आसपास और कुछ कारोबारियों के खरीद भाव इससे ऊपर। एथेनॉल उद्योग, पोल्ट्री और पशु आहार कंपनियों की मांग से बाजार को मिल रहा सहारा।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बिहार में मक्का उत्पादक किसानों के लिए इस बार बाजार से अच्छी खबर सामने आ रही है। राज्य के मक्का बाजार में कीमतों में तेजी का रुख दिखाई दे रहा है। खासकर सीमांचल और पूर्वी बिहार की मंडियों में अच्छी गुणवत्ता वाले मक्के की कीमत 3000 रुपये प्रति क्विंटल के ऐतिहासिक स्तर को छूती नजर आ रही है। पूर्णिया में प्रीमियम मक्के का कारोबारी भाव 3030 रुपये प्रति क्विंटल तक दर्ज किया गया है, जबकि खगड़िया में अच्छी गुणवत्ता वाले मक्के के भाव 2950 रुपये के आसपास बताए जा रहे हैं।

बिहार के प्रमुख मक्का उत्पादक क्षेत्रों में पूर्णिया की मंडी का विशेष महत्व है। यहां से मक्का बिहार के विभिन्न हिस्सों के साथ-साथ दूसरे राज्यों के बाजारों तक पहुंचता है। उपलब्ध कारोबारी भाव के अनुसार पूर्णिया में नंबर-1 और प्रीमियम मक्के की कीमत 3030 रुपये प्रति क्विंटल तक दर्ज की गई है। वहीं, बीडी फ्रेश और सुपर बीडी गुणवत्ता के मक्के का भाव करीब 3000 रुपये तथा सामान्य अच्छी गुणवत्ता वाले मक्के का भाव 2980 रुपये प्रति क्विंटल बताया गया है। खगड़िया में भी मक्के के भाव में मजबूती देखी जा रही है। यहां प्रीमियम गुणवत्ता वाले मक्के की कीमत करीब 2950 रुपये और अन्य श्रेणियों में 2830 से 2900 रुपये प्रति क्विंटल तक बताई गई है।
मक्के के भाव में आई इस तेजी ने किसानों की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। लंबे समय से लागत, खाद-बीज, मजदूरी और सिंचाई के बढ़ते खर्च से जूझ रहे किसानों को अब अपनी उपज का बेहतर मूल्य मिलने की उम्मीद है। हालांकि, सभी मंडियों में 3000 रुपये का भाव नहीं है। गुणवत्ता, नमी, दाना और स्थानीय मांग के आधार पर कीमतों में अंतर बना हुआ है।
बिहार अब मक्का का पूर्वी केंद्र कहलाता है।सरकारी आंकड़ा के अनुसार बिहार में मक्का का कुल बोया गया क्षेत्र लगभग 8-9 लाख हेक्टेयर (20-22 लाख एकड़) है। हर साल सरकारी लक्ष्य की बात करें तो रबी सीजन में 1.50 लाख एकड़ में 100 प्रतिशत हाइब्रिड बीज से विस्तार का लक्ष्य दिया जाता है, इथेनॉल उत्पादन के लिए। सबसे ज्यादा रबी + खरीफ + गरमा – तीनों सीजन में बिहार में मक्का होती है, इसलिए रकबा इतना बड़ा है।
मक्का की खेती पहले 7-8 जिलों में होती थी, अब 38 जिलों में विस्तार किया जा रहा है। मुख्य 3 बेल्ट हैं: कोसी-सीमांचल बेल्ट – सबसे बड़ा उत्पादक (50% से ज्यादा), पूर्णिया – 65,000 हेक्टेयर, एशिया की सबसे बड़ी मक्का मंडी – गुलाबबाग। यहां 2 लाख से ज्यादा किसान है। कटिहार – 3740 एकड़ नया लक्ष्य। अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, सहरसा, सुपौल, खगड़िया। उत्तरी बिहार बेल्ट में बेगूसराय, भागलपुर, मुंगेर, लखीसराय, समस्तीपुर, दरभंगा, मधुबनी, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चम्पारण प्रमुख जिला है। वहीं दक्षिण-पश्चिम बेल्ट – नया विस्तार है। पटना, भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, जहानाबाद – 2500 एकड़ लक्ष्य।नवादा, गया, औरंगाबाद।
चौथे कृषि रोडमैप (2023-2028) में इथेनॉल फैक्ट्री के लिए मक्का को मुख्य फसल बनाया गया है। 15 करोड़ का अलग बजट दिया गया है ताकि हर जिले में हाइब्रिड मक्का लगे। राज्य के पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, खगड़िया, बेगूसराय, समस्तीपुर और आसपास के क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर मक्के की खेती होती है। कृषि वर्ष 2024-25 के उपलब्ध जिला-स्तरीय आंकड़ों के अनुसार बिहार में मक्का उत्पादन लगभग 54.68 लाख टन दर्ज किया गया था।
मक्के की कीमतों में तेजी के पीछे सबसे बड़ा कारण इसकी औद्योगिक मांग में बढ़ोतरी को माना जा रहा है। पहले मक्के का उपयोग मुख्य रूप से पशु आहार, पोल्ट्री फीड और खाद्य उत्पादों में होता था, लेकिन अब एथेनॉल उद्योग में भी इसकी मांग बढ़ी है।
















