


@ 2017 में 1238 राहत शिविर, 2026 में अधिकतम 13; इस साल करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित, 8.27 लाख परिवारों को 7-7 हजार रुपये की मदद।
प्रदीप विद्रोही
बिहार में बाढ़ राहत का तरीका पिछले एक दशक में बदलता हुआ दिखाई दे रहा है। एक समय बाढ़ आने के बाद बड़ी संख्या में राहत शिविर खोले जाते थे, जहां विस्थापित परिवारों के रहने, खाने, पीने के पानी, स्वास्थ्य, स्वच्छता और पशुओं के लिए चारे जैसी व्यवस्थाएं की जाती थीं। अब राहत व्यवस्था का बड़ा हिस्सा सामुदायिक रसोई और सीधे बैंक खाते में नकद सहायता पहुंचाने पर केंद्रित दिखाई देता है।

इस बदलाव का सबसे स्पष्ट उदाहरण 2017 और 2026 के आंकड़ों में दिखाई देता है। 2017 की भीषण बाढ़ में बिहार में 1238 राहत शिविर खोले गए थे। उस साल 16 जिलों में 98.22 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे। राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक, उस दौरान 4.21 लाख से अधिक लोग राहत शिविरों में रह रहे थे।
इसके मुकाबले 2026 में राज्य सरकार के मुताबिक करीब 50 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए और 15 जिलों की 575 पंचायतों तक बाढ़ का असर पहुंचा। लेकिन इस दौरान राहत शिविरों की अधिकतम संख्या 13 रही। 13 राहत शिविरों में करीब 11-12 हजार लोगों को ही ठहराया गया। दूसरी तरफ, 1200 से अधिक सामुदायिक रसोइयां चलाकर करोड़ों थालियां परोसी गईं।
राहत शिविरों की जगह सामुदायिक रसोई
बिहार की मौजूदा राहत व्यवस्था को समझने के लिए राहत शिविर और सामुदायिक रसोई के बीच अंतर देखना जरूरी है।
राहत शिविर का मतलब केवल भोजन उपलब्ध कराना नहीं है। यहां विस्थापित परिवारों के रहने की जगह, भोजन, पीने का पानी, शौचालय, स्वास्थ्य सेवाएं, बच्चों के लिए जरूरी सुविधाएं और कई मामलों में पशुओं के लिए चारे की व्यवस्था भी होती है।
इसके उलट सामुदायिक रसोई का मुख्य उद्देश्य बाढ़ प्रभावित लोगों को भोजन उपलब्ध कराना है। यानी परिवार अपने घर, सड़क, बांध, तटबंध या किसी दूसरी सुरक्षित जगह पर रह सकता है और वहां से सामुदायिक रसोई में जाकर भोजन कर सकता है।
2026 की बाढ़ में यही मॉडल बड़े पैमाने पर दिखाई दिया। 13 राहत शिविरों के मुकाबले 1200 से अधिक सामुदायिक रसोइयां चलाई गईं। मुख्यमंत्री कार्यालय के अनुसार 15 सितंबर तक 1,200 से अधिक सामुदायिक रसोइयां चल रही थीं और इनके जरिए करीब 1.28 करोड़ थालियां परोसी जा चुकी थीं।
2017 में क्या अलग था?
2017 की बाढ़ का पैमाना बड़ा था। उस समय करीब 98 लाख लोग प्रभावित हुए थे और 1238 राहत शिविर बनाए गए थे। साथ ही 1646 सामुदायिक रसोइयां भी चल रही थीं।
इससे एक महत्वपूर्ण अंतर सामने आता है। उस समय सामुदायिक रसोई राहत शिविरों की जगह लेने वाली व्यवस्था नहीं थी, बल्कि राहत शिविरों के साथ चल रही थी।
2026 में स्थिति उलट दिखाई देती है। राहत शिविर बहुत कम हैं, जबकि सामुदायिक रसोइयों की संख्या बहुत अधिक है। यानी बाढ़ से विस्थापित परिवारों को एक जगह इकट्ठा कर रहने की व्यवस्था करने के बजाय सरकार बड़ी संख्या में प्रभावित इलाकों में भोजन उपलब्ध कराने और परिवारों के बैंक खातों में सहायता राशि पहुंचाने पर ज्यादा निर्भर दिखाई देती है।
2025 में भी यही पैटर्न:
यह बदलाव केवल 2026 तक सीमित नहीं है।
2025 में बिहार सरकार के आंकड़ों के अनुसार करीब 38 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित हुए थे। उस साल भी प्रभावित परिवारों को ₹7,000 प्रति परिवार की दर से डीबीटी के माध्यम से सहायता दी गई थी।
मोंगाबे हिंदी की रिपोर्ट के मुताबिक 2025 में 23 जिलों में करीब 48 लाख आबादी बाढ़ से प्रभावित हुई थी, लेकिन राहत शिविरों की संख्या केवल 18 थी, जबकि सामुदायिक रसोइयों की संख्या 1169 तक पहुंच गई थी।
इस लिहाज से 2017 से 2025 और फिर 2026 तक के आंकड़ों को साथ रखकर देखें तो राहत शिविरों पर निर्भरता कम होने और सामुदायिक रसोई तथा नकद सहायता की भूमिका बढ़ने का पैटर्न दिखाई देता है।
इस साल 7 हजार रुपये की राहत:
15 सितंबर 2026 को मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने 8,27,472 बाढ़ प्रभावित परिवारों के बैंक खातों में ₹7,000 प्रति परिवार की दर से कुल ₹579.23 करोड़ की अनुग्रह राहत राशि के डीबीटी हस्तांतरण की शुरुआत की। सरकार के मुताबिक प्रभावित परिवारों की पहचान और सत्यापन के बाद यह राशि सीधे बैंक खातों में भेजी गई।
इससे पहले भी बिहार में बाढ़ प्रभावित परिवारों को डीबीटी के जरिए राहत राशि देने का मॉडल इस्तेमाल होता रहा है। 2025 में भी 6.51 लाख प्रभावित परिवारों को ₹7,000 प्रति परिवार की दर से राशि दी गई थी।
इसलिए केवल 2026 में नकद सहायता शुरू होने की बात सही नहीं होगी। बल्कि पिछले कुछ वर्षों में डीबीटी राहत बिहार की आपदा राहत व्यवस्था का नियमित हिस्सा बनती गई है।
सवाल सिर्फ पैसे का नहीं, समय का भी है:
नकद सहायता अपने आप में राहत व्यवस्था का विकल्प हो सकती है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि पैसा कब दिया गया और प्रभावित परिवार की तत्काल जरूरत क्या है।
मोंगाबे हिंदी की रिपोर्ट में पटना के दीघा इलाके का उदाहरण सामने आता है। वहां राहत शिविर में रह रहे परिवारों को तब वापस भेजा गया, जब कई इलाकों में पानी पूरी तरह नहीं उतरा था। कुछ परिवारों के मुताबिक उनके घरों के आसपास पानी और कीचड़ था तथा सांप-बिच्छू का खतरा बना हुआ था।
इसी तरह जेपी गंगा पथ के किनारे अस्थायी रूप से रह रहे बाढ़ प्रभावित परिवारों के लिए चल रही सामुदायिक रसोई भी बंद कर दी गई थी, जबकि रिपोर्ट के मुताबिक कई परिवारों के घरों में लौटना अभी सुरक्षित नहीं था।
यहीं से नकद सहायता मॉडल की एक सीमा सामने आती है। खाते में पैसा पहुंचना जरूरी राहत है, लेकिन उससे रहने की सुरक्षित जगह, साफ पानी, शौचालय, स्वास्थ्य सुविधा या पशुओं के लिए सुरक्षित स्थान अपने आप उपलब्ध नहीं हो जाता।
सरकार का तर्क क्या है?
बिहार के आपदा प्रबंधन मंत्री रत्नेश सदा ने राहत शिविरों की कम संख्या पर कहा कि 13 नहीं बल्कि 15 राहत केंद्र खुले थे और जितने की जरूरत थी, उतने ही खोले गए।
उन्होंने यह भी कहा कि लोग अपने घर की रखवाली के लिए वापस चले जाते हैं और अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जब तक लोग रहना चाहें, उन्हें जाने के लिए नहीं कहा जाए।
यानी सरकार के पक्ष में तर्क यह है कि राहत शिविरों की संख्या प्रभावित आबादी का सीधा पैमाना नहीं है। अगर लोग अपने घरों या गांवों में रहना पसंद करते हैं तो उन्हें वहीं भोजन और दूसरी आवश्यक सेवाएं उपलब्ध कराना अधिक व्यावहारिक हो सकता है।
पूर्व आपदा प्रबंधन सचिव ब्यासजी ने भी बताया कि सामुदायिक रसोई की व्यवस्था मूल रूप से उन इलाकों के लिए विकसित हुई थी जहां बाढ़ प्रभावित लोग राहत शिविरों में आने को तैयार नहीं होते थे। खासकर दियारा और नदी किनारे के इलाकों में लोग अपने घर और पशु छोड़ना नहीं चाहते।
लेकिन क्या सामुदायिक रसोई राहत शिविर का विकल्प है? यही इस बदलाव का सबसे बड़ा सवाल है।
बिहार में बाढ़ केवल कुछ दिनों की घटना नहीं होती। कई बार पानी उतरने के बाद भी घरों में कीचड़, गंदा पानी, सांप-बिच्छू, पशुओं के लिए चारे की कमी और बीमारी का खतरा बना रहता है।
मोंगाबे हिंदी की रिपोर्ट में विशेषज्ञों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इसी अवधि को लेकर सवाल उठाया है। उनके अनुसार घर के रहने लायक होने तक परिवारों को सुरक्षित स्थान पर रखने की व्यवस्था जरूरी है।
राहत शिविर इस लिहाज से केवल भोजन वितरण केंद्र नहीं है। वह अस्थायी रूप से विस्थापित आबादी के लिए एक समग्र सुरक्षा व्यवस्था है।
सामुदायिक रसोई उस व्यवस्था का एक हिस्सा पूरा करती है – भोजन। लेकिन बाकी जरूरतों के लिए परिवार को अपनी व्यवस्था करनी पड़ती है।
क्या नकद सहायता ने पुरानी राहत को पीछे छोड़ा?
राहत राशि के स्वरूप में भी बदलाव हुआ है।
मोंगाबे हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार पहले बाढ़ से लौटने वाले परिवारों को अनाज के अलावा बर्तन और कपड़ों जैसी जरूरतों के लिए सहायता मिलती थी। बाद में अनाज के बदले ₹6,000 और बर्तन-कपड़ों के लिए ₹3,800 की राशि दिए जाने का प्रावधान रहा, यानी कुल ₹9,800।
अब राज्य में बाढ़ प्रभावित परिवारों को ₹7,000 की अनुग्रह राहत दी जा रही है।
इसमें यह सावधानी जरूरी है कि अलग-अलग वर्षों में केंद्र और राज्य के प्रावधान, मद और पात्रता अलग रही हैं। इसलिए इन रकमों की सीधे-सीधे तुलना करते समय महंगाई, केंद्र के निर्धारित मानक और राज्य सरकार द्वारा लागू प्रावधानों को साथ देखना होगा।
राहत नीति का बदलता चेहरा:
2017 और 2026 के आंकड़े किसी एक नीति दस्तावेज में दर्ज बदलाव की घोषणा नहीं करते, लेकिन वे राहत व्यवस्था में एक स्पष्ट प्रशासनिक बदलाव का संकेत जरूर देते हैं।
2017 में:
करीब 98.22 लाख लोग बाढ़ से प्रभावित थे।
1238 राहत शिविर खुले।
1646 सामुदायिक रसोइयां चलीं।
4.21 लाख से अधिक लोग राहत शिविरों में रहे।
2026 में:
करीब 50 लाख लोग प्रभावित हुए।
अधिकतम 13 राहत शिविर खुले।
1200 से अधिक सामुदायिक रसोइयां संचालित हुईं।
8.27 लाख परिवारों को ₹7,000 प्रति परिवार की डीबीटी राहत दी गई।
इन आंकड़ों को देखकर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या बिहार की बाढ़ राहत नीति अब ‘लोगों को राहत केंद्र तक लाने’ से ‘राहत को लोगों तक पहुंचाने’ के मॉडल की तरफ बढ़ रही है।
पहले मॉडल में सरकार विस्थापित परिवार की रहने और खाने की जिम्मेदारी ज्यादा व्यापक रूप से लेती है। दूसरे मॉडल में परिवार अपने स्थान पर रहता है और सरकार भोजन तथा नकद सहायता जैसी सेवाएं उपलब्ध कराती है।
असली चुनौती: पानी उतरने के बाद की राहत:
बिहार में बाढ़ राहत की बहस केवल इस बात पर नहीं होनी चाहिए कि कितने राहत शिविर खुले या कितने रुपये खातों में पहुंचे।
सवाल यह भी है कि बाढ़ का पानी उतरने के बाद परिवार कहां रहेगा? घर रहने लायक है या नहीं? खेत में फसल बची है या नहीं? पशुओं के लिए चारा है या नहीं? पीने का पानी सुरक्षित है या नहीं? बच्चों की पढ़ाई कब शुरू होगी? बीमारी फैलने की स्थिति में स्वास्थ्य सुविधा कितनी दूर है?
मोंगाबे की एक दूसरी रिपोर्ट में भी इस साल की बाढ़ के दौरान ऐसे परिवारों का जिक्र है जो घर डूबने के बाद तटबंधों और रेलवे लाइन के किनारे अस्थायी आश्रय बनाने को मजबूर हुए। कुछ परिवारों ने अपने स्तर पर बांस और तिरपाल खरीदकर रहने की जगह बनाई।
इससे पता चलता है कि बाढ़ की सरकारी राहत और लोगों की वास्तविक जरूरतों के बीच का अंतर केवल राहत राशि से नहीं मापा जा सकता।
तो क्या बिहार में राहत नीति कैंप से कैश की तरफ जा रही है?
उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर यह कहना ज्यादा सटीक होगा कि बिहार की बाढ़ राहत व्यवस्था में राहत शिविरों की तुलना में सामुदायिक रसोई और प्रत्यक्ष नकद सहायता की भूमिका पिछले वर्षों में बढ़ी है।
लेकिन इसे पूरी तरह ‘कैंप से कैश’ में बदलाव कहना अभी जल्दबाजी होगी। सरकार अब भी राहत शिविर खोलती है और सामुदायिक रसोई के साथ दूसरी राहत सामग्री भी उपलब्ध कराती है। 2026 में सरकार ने तिरपाल, सूखा राशन, भोजन और पशु चारे जैसी राहत सामग्री भी वितरित की है।
असल नीति परिवर्तन शायद यह है कि राहत शिविर अब पूरी राहत व्यवस्था का केंद्रीय आधार नहीं रह गए हैं। उनकी जगह एक विकेंद्रीकृत मॉडल उभर रहा है – जहां प्रभावित परिवार अपने स्थान पर रहें, सामुदायिक रसोई से भोजन लें और बैंक खाते में नकद सहायता प्राप्त करें।
इस मॉडल की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि बाढ़ के दौरान ही नहीं, बल्कि पानी उतरने तक और उसके बाद भी प्रभावित परिवारों की बुनियादी जरूरतें कितनी लगातार पूरी होती हैं।
आखिरकार बाढ़ राहत का सवाल केवल यह नहीं है कि सरकार ने पीड़ित परिवार के खाते में कितने रुपये भेजे। सवाल यह भी है कि जब पानी उतरने में वक्त लगे और घर रहने लायक न हो, तब उस परिवार के पास सुरक्षित रहने, खाने, पीने, इलाज और अपने पशुओं को बचाने के लिए क्या व्यवस्था है।

















