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बिहार के हितों की सुरक्षा और निर्णय प्रक्रिया में राज्य की स्पष्ट भूमिका की मांग

नई दिल्ली। पूर्णिया के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव ने केंद्रीय जल शक्ति मंत्री सी.आर. पाटिल से मुलाकात कर फरक्का बैराज और गंगा जल प्रबंधन से जुड़े मुद्दों को लेकर ज्ञापन सौंपा। उन्होंने दिसंबर 2026 में समाप्त होने वाली भारत-बांग्लादेश गंगा जल संधि के संबंध में आगे की व्यवस्था तय करने से पहले बिहार के हितों को ध्यान में रखने तथा निर्णय प्रक्रिया में राज्य की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित करने की मांग की।

भारत और बांग्लादेश के बीच 12 दिसंबर 1996 को गंगा जल संधि पर हस्ताक्षर हुए थे। यह संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है। संधि के तहत फरक्का पर गंगा के जल के बंटवारे की व्यवस्था की गई है।

सांसद पप्पू यादव ने अपने ज्ञापन में कहा कि बिहार लंबे समय से गंगा में गाद जमाव, नदी की जल-वहन क्षमता में बदलाव, कटाव और बाढ़ जैसी समस्याओं का सामना कर रहा है। उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों के लिए गंगा जल प्रबंधन की नई व्यवस्था तैयार करने से पहले बिहार की आवश्यकताओं और चिंताओं पर औपचारिक रूप से विचार किया जाना चाहिए।

उन्होंने 2026 की बाढ़ का उल्लेख करते हुए कहा कि बिहार में इस वर्ष भी बाढ़ की स्थिति गंभीर रही। उनके अनुसार गंगा में गाद जमाव और नदी की जल-वहन क्षमता में बदलाव के प्रभावों का वैज्ञानिक अध्ययन कराया जाना आवश्यक है।

पप्पू यादव ने फरक्का बैराज के इतिहास का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका निर्माण 1961 में शुरू हुआ और 1975 में यह चालू हुआ था। इसका उद्देश्य फीडर नहर के माध्यम से गंगा का पानी भागीरथी-हुगली नदी प्रणाली तक पहुंचाकर कोलकाता बंदरगाह की नौवहन क्षमता बनाए रखना था। उन्होंने कहा कि वर्तमान परिस्थितियों में बैराज के प्रभाव, गाद जमाव, नदी के स्वरूप में बदलाव और बाढ़ की स्थिति का नए सिरे से वैज्ञानिक अध्ययन किया जाना चाहिए।

उन्होंने फरक्का से बक्सर तक गंगा के पूरे हिस्से का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराने की मांग की। साथ ही नदी में गाद की स्थिति की नियमित निगरानी के लिए निगरानी केंद्र स्थापित करने तथा संवेदनशील स्थानों पर वैज्ञानिक तरीके से नदी प्रबंधन की व्यवस्था करने का सुझाव दिया।

बिहार को निर्णय प्रक्रिया में भूमिका देने की मांग

सांसद ने कहा कि 1996 की गंगा जल संधि में बिहार प्रत्यक्ष पक्षकार नहीं था, जबकि गंगा के जल प्रबंधन से जुड़े प्रभाव बिहार तक पहुंचते हैं। उन्होंने नई व्यवस्था तैयार करते समय बिहार सरकार से औपचारिक और प्रभावी परामर्श किए जाने की मांग की।

उन्होंने वर्ष 2050 तक बिहार की पेयजल, सिंचाई, उद्योग और बाढ़ प्रबंधन से संबंधित आवश्यकताओं को ध्यान में रखने की मांग की। साथ ही बाढ़ के दौरान फरक्का के फाटकों के संचालन को लेकर बिहार के लिए स्पष्ट और समयबद्ध व्यवस्था बनाने तथा फरक्का के जलस्तर और प्रवाह से संबंधित वास्तविक समय की जानकारी उपलब्ध कराने का सुझाव दिया।

पप्पू यादव ने फरक्का-बिहार बाढ़ और गाद से संबंधित अध्ययन रिपोर्ट तथा 2017-18 की विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग भी रखी। इसके अलावा पिछले पांच दशकों में फरक्का बैराज और फीडर नहर में गाद निकासी, ड्रेजिंग, रखरखाव तथा इस पर हुए खर्च का विवरण सार्वजनिक करने की मांग की।

उन्होंने बक्सर से फरक्का तक गंगा के तलछट और नदी के स्वरूप का स्वतंत्र वैज्ञानिक अध्ययन कराने पर जोर दिया। सांसद ने कहा कि बाढ़ और कटाव की समस्या का समाधान केवल तटबंधों को मजबूत करने या बड़े पैमाने पर गाद निकालने तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि गाद, नदी के प्रवाह, कटाव और जल-वहन क्षमता को ध्यान में रखकर दीर्घकालीन योजना तैयार की जानी चाहिए।

प्रभावित परिवारों के पुनर्वास और सहायता की मांग

सांसद ने बाढ़ और कटाव से प्रभावित किसानों, मछुआरों और विस्थापित परिवारों को हुए नुकसान का व्यापक आर्थिक आकलन कराने तथा प्रभावित लोगों के लिए पुनर्वास और मुआवजे की नीति तैयार करने की मांग की। उन्होंने इस वर्ष बाढ़ से हुए नुकसान के आधार पर बिहार को अतिरिक्त केंद्रीय सहायता उपलब्ध कराने की मांग भी रखी।

पप्पू यादव ने कहा कि उनका मुद्दा किसी राज्य या पड़ोसी देश के खिलाफ नहीं है। उन्होंने कहा कि गंगा जल प्रबंधन से जुड़ी नई व्यवस्था में बिहार की आबादी की सुरक्षा और उसकी जल संबंधी आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने दिसंबर 2026 में संधि की अवधि समाप्त होने से पहले बिहार की मांगों पर ठोस विचार किए जाने की आवश्यकता जताई।

इस बीच, फरक्का जल संधि को लेकर बिहार में अन्य राजनीतिक दलों और नेताओं की ओर से भी अलग-अलग मांगें सामने आई हैं। बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय कुमार चौधरी ने भी संधि की शर्तों में बदलाव और राज्य के हितों को ध्यान में रखने की मांग की है।

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