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भागलपुर संग्रहालय परिसर में कलाकार करेंगे कलाकृतियों का प्रदर्शन व विक्रय, लोक कला संरक्षण की अनूठी पहल

भागलपुर । अंग प्रदेश की गौरवशाली लोक चित्रकला मंजूषा कला के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार को नई गति देने के उद्देश्य से कला एवं संस्कृति विभाग, बिहार, जिला कला एवं संस्कृति कार्यालय तथा भागलपुर संग्रहालय के संयुक्त तत्वावधान में एक नई सांस्कृतिक पहल की शुरुआत की जा रही है। इसके तहत प्रत्येक माह के प्रथम रविवार को “मंजूषा कला प्रदर्शनी–मंजूषा हटिया” का आयोजन किया जाएगा। इस श्रृंखला की पहली एक दिवसीय प्रदर्शनी का आयोजन 07 जून को प्रातः 10:30 बजे से सायं 5 बजे तक भागलपुर संग्रहालय परिसर में किया जाएगा।

इस आयोजन का उद्देश्य मंजूषा कला से जुड़े कलाकारों को एक ऐसा सार्वजनिक मंच उपलब्ध कराना है, जहां वे अपनी कला का प्रदर्शन कर सकें, कला प्रेमियों से सीधे संवाद स्थापित कर सकें और अपनी कलाकृतियों का विक्रय भी कर सकें। प्रदर्शनी में भाग लेने वाले कलाकार हस्तनिर्मित पेंटिंग्स, पारंपरिक मंजूषा डिजाइनों तथा इस लोक कला पर आधारित विभिन्न रचनात्मक उत्पादों का प्रदर्शन करेंगे।

आयोजकों का मानना है कि इस पहल से कलाकारों को आर्थिक मजबूती मिलेगी तथा मंजूषा कला के प्रति समाज में जागरूकता और रुचि का विस्तार होगा। साथ ही युवा पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ने का अवसर भी प्राप्त होगा।

अंग संस्कृति की पहचान है मंजूषा कलामंजूषा कला अंग क्षेत्र की एक प्राचीन और विशिष्ट लोक चित्रकला परंपरा है, जो प्रसिद्ध बिहुला-विषहरी लोकगाथा से जुड़ी हुई है। अपनी अनूठी रेखांकन शैली, सीमित रंगों के प्रयोग और प्रतीकात्मक आकृतियों के कारण यह कला देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी पहचान बना चुकी है। हाल के वर्षों में मंजूषा कला को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सराहना मिली है, लेकिन इसके कलाकारों को अभी भी व्यापक बाजार और स्थायी अवसरों की आवश्यकता महसूस की जाती रही है।

 

इसी आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए “मंजूषा हटिया” की परिकल्पना की गई है, ताकि कलाकारों और आम लोगों के बीच सीधा संवाद स्थापित हो सके तथा कला को बाजार से भी जोड़ा जा सके।

कलाकारों और कला प्रेमियों के बीच बनेगा सीधा संवाद

प्रदर्शनी में आने वाले दर्शकों को कलाकारों से सीधे बातचीत करने, उनकी कला प्रक्रिया को समझने और बिना किसी मध्यस्थ के उनकी कलाकृतियां खरीदने का अवसर मिलेगा। इससे कलाकारों को सम्मानजनक पहचान मिलने के साथ-साथ उनकी आय के नए स्रोत भी विकसित होंगे।

कला विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रकार के आयोजनों से लोक कला केवल संग्रहालयों और पुस्तकों तक सीमित नहीं रहती, बल्कि आम लोगों के जीवन का हिस्सा बनती है। यही कारण है कि इस आयोजन को भविष्य में एक बड़े सांस्कृतिक बाजार और लोक कला संवाद मंच के रूप विकसित करने की योजना बनाई गई है।

कला को बाजार और युवाओं से जोड़ने की पहल

जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन ने बताया कि विभाग का प्रयास है कि मंजूषा कला को केवल प्रदर्शनी तक सीमित न रखकर उसे जनजीवन, शिक्षा, युवाओं और बाजार से जोड़ा जाए। उन्होंने कहा कि यदि कलाकारों को नियमित मंच और बाजार उपलब्ध हो तो यह कला आत्मनिर्भरता का माध्यम बनने के साथ-साथ क्षेत्रीय सांस्कृतिक पहचान को भी मजबूत करेगी।

उन्होंने बताया कि पहली प्रदर्शनी के संयोजक डॉ. उलूपी कुमारी झा एवं प्रसिद्ध मंजूषा गुरु मनोज कुमार पंडित होंगे। आगे प्रत्येक माह अलग-अलग कलाकारों को संयोजक बनाकर इस आयोजन को और व्यापक स्वरूप दिया जाएगा।

लोगों से सहभागिता की अपील

जिला प्रशासन एवं कला एवं संस्कृति विभाग ने भागलपुर एवं आसपास के क्षेत्रों के कला प्रेमियों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं, पर्यटकों और आम नागरिकों से प्रदर्शनी में अधिकाधिक संख्या में शामिल होने की अपील की है। विभाग का मानना है कि समाज के सहयोग और सहभागिता से ही मंजूषा जैसी अमूल्य लोक कलाओं को नई पहचान और स्थायी संरक्षण मिल सकेगा।

आयोजकों के अनुसार यह प्रदर्शनी केवल कला प्रदर्शन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि अंग प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने और स्थानीय कलाकारों को सम्मानजनक मंच उपलब्ध कराने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।

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