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पूर्णिया: आधुनिक भारत में शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। एक समय था जब विद्यालय ज्ञान का मुख्य केंद्र हुआ करते थे, जहां शिक्षक अपने अनुभव और ज्ञान से छात्रों का समग्र विकास करते थे। लेकिन वर्तमान समय में निजी विद्यालयों की बढ़ती संख्या ने शिक्षा को व्यवसाय का रूप दे दिया है।

आज कई निजी स्कूलों में स्थिति यह है कि किताबें, जूते, मोजे, बैग और ड्रेस जैसी आवश्यक वस्तुएं भी विद्यालय द्वारा तय दुकानों से ही खरीदने के लिए अभिभावकों को बाध्य किया जाता है। इससे अभिभावकों पर आर्थिक बोझ बढ़ता है और शिक्षा एक सेवा के बजाय व्यापार का रूप ले लेती है।

विडंबना यह है कि भारी-भरकम फीस और महंगे संसाधनों के बावजूद छात्रों को विद्यालयों से अपेक्षित गुणवत्ता की शिक्षा नहीं मिल पाती। अधिकांश छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने के लिए ट्यूशन या होम ट्यूशन का सहारा लेने को मजबूर हैं। कई मामलों में शिक्षक भी कक्षा में पूरी मेहनत नहीं करते और छात्रों को ट्यूशन के लिए प्रेरित करते हैं, जिससे शिक्षा व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आधुनिक शिक्षा प्रणाली में दिखावे और बाहरी व्यवस्थाओं को अधिक महत्व दिया जा रहा है, जबकि ज्ञान और नैतिक शिक्षा पीछे छूटती जा रही है। इसका असर छात्रों के बौद्धिक और नैतिक विकास पर पड़ रहा है।

इसके अलावा, यह व्यवस्था आर्थिक असमानता को भी बढ़ावा देती है। गरीब और मध्यम वर्ग के अभिभावकों के लिए इन खर्चों को वहन करना कठिन होता जा रहा है, जिससे उनके बच्चों की शिक्षा प्रभावित होती है। शिक्षा, जो समान अवसर का माध्यम होनी चाहिए, अब असमानता का कारण बनती जा रही है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि सरकार को निजी विद्यालयों पर सख्त नियम लागू करने चाहिए, ताकि अनावश्यक वस्तुओं की बिक्री पर रोक लगाई जा सके। साथ ही, विद्यालयों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, जिससे छात्रों को ट्यूशन पर निर्भर न रहना पड़े।

अंततः, आधुनिक शिक्षा का यह स्वरूप चिंताजनक है। यदि समय रहते इसमें सुधार नहीं किया गया, तो शिक्षा का मूल उद्देश्य—ज्ञान, नैतिकता और व्यक्तित्व विकास—प्रभावित हो सकता है। समाज और सरकार दोनों को मिलकर इस दिशा में ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

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