
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर।जिले के गोपालपुर विधानसभा के पूर्व विधायक गोपाल मंडल की जुबान और सुर्खियों का रिश्ता कुछ पुराना है। फर्क बस इतना है कि कभी सुर्खियां उनके बयान से बनती हैं, कभी उनकी हरकतों से और कभी दोनों मिलकर खबर को ऐसा मसाला दे देते हैं कि अखबार की स्याही भी सोचने लगे – आज फिर क्या बोल गए नेताजी!
पूर्व विधायक की बेबाकी कोई नई चीज नहीं है। विधायक रहते हुए भी उनके बयान और अंदाज-ए-बयां राजनीतिक गलियारों से लेकर आम चौक-चौराहों तक चर्चा का विषय बनते रहे हैं। अब एक बार फिर उनकी जुबान ने राजनीतिक तापमान बढ़ा दिया है।
ताजा मामला विक्रमशिला सेतु को लेकर सामने आया है। त्योहारी मौसम के बीच सेतु को बंद किए जाने के निर्णय से गंगा के दोनों ओर आवाजाही प्रभावित होने की बात को लेकर लोगों में नाराजगी है। इसी मुद्दे पर अपनी चिर-परिचित बेबाक शैली में गोपाल मंडल ने गंगा पार के दोनों मंत्रियों बुलो मंडल (ऊर्जा मंत्री) और ई. शैलेन्द्र (पथ निर्माण मंत्री) पर निशाना साध दिया।

पूर्व विधायक ने कथित तौर पर कहा कि त्योहार यानी छठ के बाद विक्रमशिला सेतु को बंद करने की बात सभी ने कही, लेकिन दोनों मंत्रियों ने बात नहीं सुनी। इन दोनों ने इस बात को सरका तक नहीं पहुंचाया। इसी क्रम में उन्होंने दोनों के लिए आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करते हुए उन्होंने ऊर्जा मंत्री बुलो मंडल और पथ निर्माण मंत्री ई शैलेन्द्र को ‘मौगा’ तक कह दिया और दावा किया कि आने दीजिए चुनाव जनता इसका जवाब देगी।
अब बयान में राजनीति कम है या राजनीतिक बयान में तंज ज्यादा – इसका फैसला आमजन करें। लेकिन इतना जरूर है कि गोपाल मंडल के बयान ने एक बार फिर राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है।
सेतु बंद, सियासत चालू:
विक्रमशिला सेतु की मरम्मत और पुनर्स्थापना का मुद्दा तकनीकी भले हो, लेकिन उसका असर पूरी तरह राजनीतिक दिखाई दे रहा है। सेतु बंद होने का मतलब केवल वाहनों का रास्ता बंद होना नहीं है। गंगा के दोनों ओर रहने वाले लोगों की रोजमर्रा की आवाजाही, व्यापार, रोजगार, मरीजों की आवाजाही और त्योहारों के दौरान आवागमन – सब इससे प्रभावित हो चुके हैं। ऐसे में जनता की नाराजगी स्वाभाविक है। इसी नाराजगी को गोपाल मंडल ने अपने अंदाज में राजनीतिक हथियार बना लिया है। हालांकि उनके शब्दों की मर्यादा पर बहस हो सकती है, लेकिन सेतु बंद होने को लेकर जनता की परेशानी को उन्होंने जिस तल्खी से उठाया, उससे यह मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।
गोपाल मंडल की ‘बेबाकी’ का अपना इतिहास:

गोपाल मंडल की राजनीतिक शैली में शायद ‘फिल्टर’ नाम की कोई चीज बहुत कम दिखाई देती है। मन में आया, माइक मिला और बात बाहर। यही उनकी सार्वजनिक छवि का एक हिस्सा बन चुकी है।विधायक रहते हुए उनके कई बयान और व्यवहार चर्चाओं में रहे। ट्रेन में चड्ढी पहनकर घूमने की घटना हो, मंच पर डांसर के साथ ठुमके लगाने की चर्चा हो, डांसर के गाल पर नोट चिपकाने का मामला हो, अश्लील फगुआ गीत से जुड़ा विवाद हो या फिर राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों पर तीखी और अमर्यादित टिप्पणी – गोपाल मंडल का नाम विवादों से अछूता नहीं रहा।राजनीति में जहां अधिकांश नेता बयान देने से पहले दस बार सोचते हैं, वहीं गोपाल मंडल की राजनीति में कभी-कभी लगता है कि बयान पहले आता है और विचार बाद में।
जनता नाराज है, लेकिन किससे:
फिलहाल दिलचस्प पहलू यह है कि उनके बयान के आपत्तिजनक शब्दों पर भले राजनीतिक बहस छिड़ सकती है, लेकिन विक्रमशिला सेतु बंद होने के मुद्दे पर आम लोगों की नाराजगी वास्तविक है।त्योहारी मौसम में सेतु बंद करने का फैसला गंगा के दोनों किनारों के लोगों के लिए परेशानी का कारण बन रहा है। ऐसे में जनता के बीच यह सवाल जरूर है कि आखिर मरम्मत भी हो और लोगों की परेशानी भी कम से कम हो – इसका रास्ता क्या है।गोपाल मंडल ने इसी जनभावना को पकड़कर मंत्रियों पर हमला बोला है। अब उनके शब्द राजनीतिक मर्यादा की कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं, यह अलग बहस है। मगर इतना तय है कि उन्होंने ऐसा बयान दे दिया है जिसे राजनीतिक दलों के पास नजरअंदाज करने का विकल्प शायद ही बचा हो।
चुनाव अभी दूर है, लेकिन बयानबाजी शुरू:
गोपाल मंडल ने अपने बयान में आने वाले चुनाव का भी जिक्र कर दिया। यानी सेतु अभी बंद हुआ है या होने वाला है, लेकिन राजनीतिक रास्ते खुल गए हैं।एक तरफ सेतु की मरम्मत का सवाल है, दूसरी तरफ जनता की परेशानी और तीसरी तरफ चुनावी राजनीति। ऐसे में आने वाले दिनों में विक्रमशिला सेतु केवल इंजीनियरों और प्रशासन के लिए चुनौती नहीं रहेगा, बल्कि नेताओं के लिए भी बयानबाजी का नया पुल बन सकता है।फिलहाल गोपाल मंडल ने अपनी जुबान से वह काम कर दिया है, जो कई नेता प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाकर भी नहीं कर पाते – सुर्खियां बटोर लीं। अब देखना यह है कि सेतु कब बंद होता है, कब खुलता है और उससे पहले राजनीतिक बयानबाजी का कौन-सा पुल टूटता है और कौन-सा बनता है।















