


@ दियारा क्षेत्रों में बाढ़ और कटाव के दौरान चारे की कमी कोई नई समस्या नहीं है। ऐसे समय में पशुपालक मवेशियों को लेकर शहर या सुरक्षित इलाकों की ओर निकलते हैं। इस बार विक्रमशिला पुल पर लगी रोक ने इस पारंपरिक व्यवस्था को ही रोक दिया है। भूख से दुधारू पशुओं की स्थिति बुरी हो रही है।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। शहर की सड़कों पर ट्रैफिक जाम तो आपने खूब देखा होगा, लेकिन भागलपुर में इन दिनों एक ऐसा जाम खड़ा दिखता है, जिसमें वाहन नहीं बल्कि पांच हजार से ज्यादा भैंसें फंसी हैं। वजह है गंगा का बढ़ता जलस्तर और क्षतिग्रस्त विक्रमशिला सेतु। बाढ़ के समय जब खेत – खलिहान, घर – द्वार सब पानी में समा जाते हैं तब पशुपालक अपनी फिक्र के साथ अपने पशुओं को भी बचाने यानी सुरक्षित स्थानों पर ले जाने की चिंता से परेशान हो उठते हैं। इधर गंगा और कोशी भी रौद्र रूप धारण करने को आतुर है।
हर साल सावन-भादो में गंगा के तेवर बदलते ही दियारा के पशुपालक अपने मवेशियों को सुरक्षित ठिकानों की ओर ले जाने लगते हैं। वज़ह चारा का अभाव भी होता है। इस बार रास्ते में विक्रमशिला सेतु की क्षतिग्रस्त हालत और सुरक्षा कारणों से बनाए गए अस्थायी बेली ब्रिज ने उनकी मुश्किल कई गुना बढ़ा दी है।
पुल पर भैंसों की एंट्री बंद है। दूसरी तरफ दियारा में बाढ़ और चारे का संकट बढ़ रहा है। ऐसे में पशुपालक अपनी भैंसों को लेकर अनुमति के लिए ट्रैफिक पुलिस के चक्कर काट रहे हैं। उनके सामने सवाल सिर्फ आवागमन का नहीं, बल्कि हजारों पशुओं को बचाने का है। भूख से बिलबिलाते पशु जाए तो जाए कहां।

बाढ़ बढ़ी तो चारा कहां से आएगा:
दियारा क्षेत्रों में बाढ़ और कटाव के दौरान चारे की कमी कोई नई समस्या नहीं है। ऐसे समय में पशुपालक मवेशियों को लेकर शहर या सुरक्षित इलाकों की ओर निकलते हैं। इस बार पुल पर लगी रोक ने इस पारंपरिक व्यवस्था को ही रोक दिया है।
भागलपुर में हुई पशुगणना के शुरुआती आंकड़े भी बताते हैं कि यहां पशुधन की संख्या कम नहीं है। गणना में करीब 4.74 लाख पशुओं की गिनती हुई है। पिछले आंकड़ों की तुलना में पशुधन में लगभग 23 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। ऐसे में बाढ़ के दिनों में पशुओं की सुरक्षित आवाजाही आने वाले दिनों में बड़ी चुनौती बन सकती है।
रात में बनेगा ‘भैंस कॉरिडोर’:
ट्रैफिक डीएसपी संजय कुमार के अनुसार, फिलहाल पुल की सुरक्षा और जनसुरक्षा को देखते हुए भैंसों के पुल पार करने पर रोक है। हालांकि प्रशासन पशुपालकों की परेशानी का समाधान निकालने में जुटा है। सावन समाप्त होने के बाद पुलिस रात के समय दो से तीन सौ भैंसों के जत्थे को शिफ्टवार पुल पार कराने की योजना बना रही है। यानी दिन में जिस पुल पर वाहनों का दबाव रहता है, उसी पुल पर रात में भैंसों के लिए अलग ‘कॉरिडोर’ बनाने की तैयारी है।

असली सवाल यही है…
एक तरफ क्षतिग्रस्त पुल की सुरक्षा है, दूसरी तरफ बाढ़ के मुहाने पर खड़ा दियारा और उसके साथ हजारों पशुपालकों की रोजी-रोटी। प्रशासन के सामने चुनौती सिर्फ पुल पर ट्रैफिक नियंत्रित करने की नहीं, बल्कि बाढ़ से पहले पशुधन को सुरक्षित निकालने की भी है। फिलहाल विक्रमशिला सेतु के दूसरी तरफ खड़े हजारों पशुपालकों के लिए घड़ी की सुई बाढ़ के पानी के साथ आगे बढ़ रही है।
















