


प्रदीप विद्रोही
सुल्तानगंज। कांवर पथ पर हर कदम के साथ आस्था की अनगिनत कहानियां जन्म लेती हैं। कोई नंगे पांव चलता है, कोई दौड़ते हुए डाक बम बनता है, तो कोई दंडवत देकर अपनी श्रद्धा अर्पित करता है। लेकिन इस बार श्रावणी मेले में एक ऐसी तस्वीर सामने आई है, जिसे देखकर राहगीरों के कदम खुद-ब-खुद ठहर जा रहे हैं।

दोनों घुटने लहूलुहान हैं… हर कुछ कदम पर दर्द चेहरे पर साफ झलकता है… लेकिन होंठों पर मुस्कान है और आंखों में सिर्फ बाबा बैद्यनाथ के दर्शन की आस। यह हैं लखीसराय के सुबोध कुमार सिंह, जिन्होंने इस बार सुल्तानगंज से देवघर तक की पूरी यात्रा घुटनों के बल करने का संकल्प लिया है।
सुबोध के लिए कठिन यात्राएं नई नहीं हैं। वह अब तक नौ बार दंडवत यात्रा पूरी कर बाबा बैद्यनाथ के दरबार पहुंच चुके हैं। लेकिन इस बार उनकी साधना और भी कठिन है। घुटनों के सहारे आगे बढ़ते हुए उनका हर इंच सफर मानो शरीर नहीं, विश्वास तय कर रहा है।
जब उनसे पूछा गया कि इतनी कठिन राह क्यों चुनी, तो उनका जवाब किसी दर्शन से कम नहीं था – ‘बाबा जिस रूप में बुलाते हैं, भक्त उसी रूप में चल पड़ता है। यात्रा मनुष्य नहीं, बाबा की इच्छा तय करती है। मेरी कोई मनोकामना नहीं, कोई अभिलाषा नहीं… बस बाबा के प्रति श्रद्धा और अटूट विश्वास है।’
दंडवत यात्रा में उन्हें देवघर पहुंचने में आमतौर पर 20 से 25 दिन लगते थे। इस बार कितने दिन लगेंगे, इसका अंदाजा उन्हें भी नहीं। मुस्कुराते हुए कहते हैं, ‘यह मैं नहीं तय करता, बाबा तय करते हैं। जब उनकी इच्छा होगी, तब उनके दरबार तक पहुंच जाऊंगा।’
श्रावणी मेले के दूसरे ही दिन उनकी घुटनों के बल यात्रा का दूसरा चरण पूरा हो चुका है। हालांकि अब उनके दोनों घुटने बुरी तरह छिल चुके हैं और खून भी निकल रहा है, लेकिन उनकी गति नहीं थमी है। दर्द के आगे उनकी आस्था झुकने को तैयार नहीं।
कांवर पथ पर उन्हें देखकर श्रद्धालु रुक जाते हैं। कोई पानी पिलाता है, कोई दवा लगाने की सलाह देता है, तो कोई हाथ जोड़कर उनके संकल्प को प्रणाम करता है। कई लोगों की आंखें यह दृश्य देखकर नम हो जाती हैं।
इस कठिन तपस्या में सुबोध अकेले नहीं हैं। उनके साथ एक अन्य शिवभक्त हर पल छाया की तरह चल रहे हैं। वहीं एक वाहन भी साथ-साथ चल रहा है, जिसमें दवाइयां, भोजन और अन्य जरूरी सामान रखा गया है, ताकि जरूरत पड़ने पर तुरंत सहायता मिल सके।
सुबोध मानते हैं कि यह यात्रा केवल शरीर की ताकत का नहीं, बल्कि धैर्य, विश्वास और पूर्ण समर्पण का परीक्षण है। उनके शब्दों में, ‘पूर्वाभ्यास शरीर को तैयार कर सकता है, लेकिन बाबा के दरबार तक पहुंचाना केवल उनकी कृपा से ही संभव होता है।’
श्रावणी मेले में जहां लाखों कांवरिए अपने-अपने तरीके से आस्था की राह पर आगे बढ़ रहे हैं, वहीं सुबोध कुमार सिंह की यह घुटनों के बल यात्रा एक अलग ही संदेश दे रही है – भक्ति का कोई एक स्वरूप नहीं होता। कोई पैरों से चलता है, कोई दंडवत देता है और कोई लहूलुहान घुटनों के सहारे मंजिल तक पहुंचने का संकल्प निभाता है।
कांवर पथ पर उन्हें देखने वाले श्रद्धालुओं की जुबान पर बस एक ही बात है – ‘जब आस्था संकल्प बन जाती है, तब दर्द भी रास्ता छोड़ देता है और मंजिल खुद करीब आने लगती है।”

















