


@ 30 दिन के कानून को 8 – 9 साल की सरकारी चाल ने बनाया मजाक, सूचना आयोग के आदेश पर उठे गंभीर सवाल।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। ‘RTI की अर्थी निकली… सूचना आयुक्त ने कहा – राम नाम सत्य!’ यह कोई फिल्मी संवाद नहीं, बल्कि सूचना के अधिकार की लड़ाई लड़ रहे RTI कार्यकर्ता अजीत कुमार सिंह का तीखा व्यंग्य है। उनका आरोप है कि जिन सूचनाओं को समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराया जाना चाहिए था, उन्हें पाने के लिए उन्हें 8 से 9 वर्ष तक इंतजार करना पड़ा और अंत में कार्रवाई के नाम पर मिली – ‘कड़ी चेतावनी’। सवाल सीधा है – जब RTI कानून सूचना देने की समयसीमा तय करता है, तो सरकारी दफ्तरों में एक सूचना को लगभग एक दशक तक रोककर रखने की कीमत कौन चुकाएगा?
और उससे भी बड़ा सवाल – क्या ‘कड़ी चेतावनी’ इतनी लंबी देरी का पर्याप्त जवाब है? तीन मामले, तीन बड़े सवाल। अजीत कुमार सिंह द्वारा उठाए गए तीन मामलों में मांगी गई सूचनाएं भी ऐसी थीं, जिनका सीधा संबंध सार्वजनिक संपत्ति, सरकारी धन और जनहित से बताया गया है।
वाद संख्या: A-5135/2018
मांगी गई सूचना: एकड़ लाजपत पार्क से संबंधित दानपत्र/डीड एवं खतियान
शिकायतकर्ता के अनुसार देरी: करीब 8 वर्ष 6 माह
कड़ी चेतावनी।

वाद संख्या: A-5192/2018
मांगी गई सूचना: NULM आश्रय स्थल के टेंडर एवं करीब ₹49 लाख के खर्च का हिसाब
शिकायतकर्ता के अनुसार देरी:करीब 8 वर्ष
PIO दोषी प्रतीत होने की टिप्पणी और कड़ी चेतावनी।
वाद संख्या: A-5191/2018
मांगी गई सूचना: सिल्क भवन से जुड़े करीब ₹10 करोड़ के फंड एवं संबंधित विवरण
शिकायतकर्ता के अनुसार देरी: करीब 9 वर्ष
कड़ी चेतावनी।
यहीं से मामला महज RTI की देरी का नहीं रह जाता, बल्कि सरकारी जवाबदेही की प्रभावशीलता का सवाल बन जाता है।
लाजपत पार्क से जुड़े मामले में 23 एकड़ जमीन के दानपत्र और खतियान की जानकारी मांगी गई थी। शिकायतकर्ता के मुताबिक, जवाब की प्रक्रिया में वर्षों लग गए।
अब सवाल यह है कि इतने महत्वपूर्ण भूमि अभिलेखों की सूचना के लिए नागरिक को वर्षों तक इंतजार क्यों करना पड़ा? ₹49 लाख का हिसाब और आठ साल का इंतजार। दूसरे मामले में NULM आश्रय स्थल के टेंडर और करीब ₹49 लाख के खर्च से संबंधित जानकारी मांगी गई थी।
बताया गया कि पहला टेंडर रद्द हुआ और करीब ₹34.74 लाख खर्च होने की बात सामने आई। लेकिन खर्च का पूरा हिसाब सामने आने में वर्षों लग गए। जनता का सवाल है – सरकारी धन का हिसाब मांगना इतना कठिन क्यों होना चाहिए? ₹10 करोड़ के सवाल पर 9 साल। तीसरा मामला सिल्क भवन से जुड़े करीब ₹10 करोड़ के फंड और संबंधित विवरण का है।
यदि संबंधित विभाग का पक्ष यह है कि राशि प्राप्त ही नहीं हुई, तो फिर सवाल और आसान होना चाहिए था – राशि नहीं आई तो रिकॉर्ड में क्या दर्ज है। लेकिन शिकायतकर्ता के अनुसार इस सूचना की प्रक्रिया में करीब 9 वर्ष लग गए। RTI कार्यकर्ता अजीत कुमार सिंह का सबसे तीखा सवाल सामने आता है – ‘नौ साल तक फाइल दबाने के बाद अगर कार्रवाई सिर्फ कड़ी चेतावनी है, तो फिर आम नागरिक अपने अधिकार के लिए किस दरवाजे पर जाए?’
धारा 20 है, फिर दंड कहां है? RTI Act की धारा 20 में निर्धारित परिस्थितियों में सूचना आयोग द्वारा दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान है।
ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि किसी मामले में सूचना देने में असामान्य और लंबी देरी हुई, तो दंडात्मक प्रावधानों पर विचार क्यों नहीं हुआ?
क्या हर देरी का अंत सिर्फ एक चेतावनी से होगा?
अगर ऐसा है, तो क्या इससे संबंधित अधिकारियों में समय पर सूचना देने की जवाबदेही वास्तव में मजबूत होगी?
‘कड़ी चेतावनी’ या सरकारी सिस्टम की कमजोर चेतावनी?
व्यंग्य यहीं सबसे ज्यादा चुभता है – RTI आई – फाइल सो गई। वर्ष गुजर गए – फाइल सोती रही।
आयोग पहुंचा मामला – फाइल जागी और आखिर में आदेश आया – ‘कड़ी चेतावनी!’ यानी जनता का इंतजार वर्षों का और कार्रवाई कुछ शब्दों की! आरटीआई कार्यकर्ता अजीत कुमार सिंह का कहना है कि RTI को Right to Information से Right to Ignore बनने नहीं दिया जा सकता। उनके शब्दों में – ‘फाइल बंद हो सकती है, लेकिन सवाल बंद नहीं होंगे।’
सूचना आयुक्त के आदेश पर अब जनहित का सवाल
यहां मुद्दा किसी व्यक्ति विशेष को कठघरे में खड़ा करना भर नहीं है। असली सवाल है कि सूचना आयोग के आदेशों में ऐसी धार कितनी है, जिससे सरकारी तंत्र समय पर सूचना देने के लिए बाध्य हो?
यदि वर्षों की देरी के बाद भी परिणाम केवल चेतावनी है, तो फिर नागरिक के उस अधिकार का क्या होगा, जिसकी रक्षा के लिए RTI कानून बनाया गया?
न कोई खौफ बचा है चोरों के दिल में, न आयोग के आदेशों में कोई धार बची है। बस औपचारिकता के नाम पर धड़कनों की अर्थी सजी है।
अब सवाल जनता के सामने है – क्या ‘कड़ी चेतावनी’ 8–9 साल के इंतजार का जवाब है? क्या वर्षों की देरी के लिए जिम्मेदारी तय होगी? क्या यह स्पष्ट किया जाएगा कि सूचना देने में इतनी देर क्यों हुई और सबसे महत्वपूर्ण – क्या भविष्य में किसी नागरिक को अपनी ही सरकार से सूचना पाने के लिए आधी उम्र इंतजार करना पड़ेगा?
RTI कार्यकर्ता अजीत कुमार सिंह ने सूचना आयोग से जनहित में अधिक प्रभावी और जवाबदेह कार्रवाई की मांग करते हुए कहा है – ‘जागिए सूचना आयुक्त महोदय! आपके ये बेअसर आदेश न्याय की उम्मीदों का गला घोंट रहे हैं। अब भी समय है – जनहित में धार लाइए।’ अजीत कुमार सिंह कहते हैं- क्योंकि लोकतंत्र में सूचना कोई एहसान नहीं।सूचना जनता का अधिकार है और जवाबदेही लोकतंत्र की ताकत।
















