
गोसाई गांव सहित पूरे नवगछिया क्षेत्र में दिखा उत्साह, ठेकुआ, फल, खीर और मिट्टी के बर्तन में जमाए दही से चंद्रदेव को अर्पित किया गया नैवेद्य
नवगछिया। भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्थी के अवसर पर सोमवार को नवगछिया अनुमंडल के गोपालपुर प्रखंड अंतर्गत गोसाई गांव सहित पूरे नवगछिया क्षेत्र में मिथिला की लोक आस्था और पारंपरिक संस्कृति से जुड़ा चौरचन पर्व (चौठ चंद्र) श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया गया। गणेश चतुर्थी के दिन मनाए जाने वाले इस पर्व में शाम के समय घर-घर महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर चंद्रदेव को अर्घ्य दिया। पूजा के बाद परिवार के सदस्यों ने फल हाथ में लेकर चंद्रमा के दर्शन किए और सुख-समृद्धि तथा परिवार की मंगलकामना की।

धार्मिक एवं लोक परंपराओं के अनुसार चौरचन पर्व का संबंध भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्र दर्शन से जुड़ी मान्यता से है। इसे मिथिला सहित बिहार के कई क्षेत्रों में चौठ चंद्र, चौरचन अथवा चौथ चंद्र के नाम से जाना जाता है। मान्यता है कि इस दिन बिना विधि-विधान के चंद्रमा का दर्शन करने पर मिथ्या कलंक का भय रहता है। इसी मान्यता के कारण पहले भगवान गणेश की पूजा और फिर चंद्रदेव की पूजा कर फल हाथ में लेकर चंद्र दर्शन करने की परंपरा चली आ रही है।
आंगन में बनाया गया अरिपन, सजाई गई पूजा की डाली

चौरचन पर्व को लेकर सुबह से ही घरों में तैयारियां शुरू हो गई थीं। महिलाओं ने स्नान आदि के बाद पूजा सामग्री तैयार की। शाम के समय घर के आंगन में पिठार यानी चावल के घोल से पारंपरिक अरिपन बनाया गया। इसके बाद पूजा स्थल पर चंद्र मंडल की आकृति बनाकर उसके आसपास पूजा सामग्री सजाई गई।
पूजा की डाली में विभिन्न प्रकार के पारंपरिक पकवान, फल, मिठाई, ठेकुआ, पिरुकिया आदि रखे गए। इस पर्व की खास पहचान मिट्टी के बर्तन में जमाया गया दही भी रहा। स्थानीय स्तर पर इसे विशेष श्रद्धा के साथ पूजा सामग्री में शामिल किया गया। कई घरों में खीर, पूड़ी और अन्य पकवान भी तैयार किए गए। चंद्रमा के उदय के बाद महिलाओं ने विधि-विधान से पूजा कर अर्घ्य अर्पित किया।
मंत्रोच्चारण के बाद किया गया चंद्र दर्शन
चौरचन पूजा में विशेष मंत्र के उच्चारण के साथ चंद्रमा का दर्शन करने की परंपरा है। पूजा के दौरान श्रद्धालुओं द्वारा प्रचलित मंत्र का पाठ किया गया—
“सिंहः प्रसेनमवधीत्, सिंहो जाम्बवता हतः।
सुकुमारक मा रोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकः॥”
धार्मिक मान्यता के अनुसार इस मंत्र का संबंध भगवान कृष्ण और स्यमन्तक मणि की कथा से है तथा इसे चतुर्थी के चंद्र दर्शन से जुड़े मिथ्या कलंक के निवारण से जोड़ा जाता है।
पूजा के दौरान व्रती महिलाओं ने चंद्रमा को अर्घ्य दिया और फल-फूल अर्पित किए। इसके बाद हाथ में फल लेकर चंद्रदेव का दर्शन किया गया और परिवार के अन्य सदस्यों ने भी श्रद्धापूर्वक चंद्रमा को प्रणाम किया। पूजा संपन्न होने के बाद प्रसाद का वितरण किया गया।
भगवान गणेश और चंद्रमा की कथा से जुड़ा है पर्व
चौरचन पर्व को लेकर प्रचलित पौराणिक मान्यता भगवान गणेश और चंद्रमा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार चंद्रमा को अपने रूप पर अभिमान था और उन्होंने भगवान गणेश का उपहास किया। इससे भगवान गणेश अप्रसन्न हुए और उन्होंने चंद्रमा को श्राप दिया कि भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन जो भी उनका दर्शन करेगा, उसे मिथ्या कलंक का सामना करना पड़ सकता है। बाद में चंद्रमा ने भगवान गणेश की आराधना कर क्षमा मांगी। इसके बाद भगवान गणेश ने चंद्रमा को वरदान दिया कि विधि-विधान से गणेश और चंद्रमा की पूजा कर मंत्र के साथ चंद्र दर्शन करने वाले व्यक्ति को इस दोष से मुक्ति मिलेगी। इसी धार्मिक मान्यता के आधार पर चौठ चंद्र की पूजा की परंपरा मानी जाती है।
एक अन्य प्रचलित कथा में भगवान श्रीकृष्ण और स्यमन्तक मणि का प्रसंग भी चौरचन पर्व से जोड़ा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कृष्ण पर लगे मिथ्या आरोप और चतुर्थी के चंद्र दर्शन के बीच संबंध बताया गया है। इसी कारण पूजा के समय स्यमन्तक मणि से संबंधित मंत्र का पाठ करने की परंपरा है।
महिलाओं के व्रत और पारिवारिक सुख-समृद्धि की कामना
चौरचन पर्व में महिलाओं की विशेष भूमिका रहती है। कई परिवारों में महिलाएं दिनभर उपवास रखकर शाम को पूजा-अर्चना के बाद व्रत खोलती हैं। पूजा के दौरान परिवार की सुख-शांति, संतान की मंगलकामना, दीर्घायु तथा समृद्धि की प्रार्थना की जाती है। हालांकि अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में पूजा की विधि एवं लोक परंपराओं में कुछ अंतर भी देखने को मिलता है।
गोसाई गांव सहित नवगछिया के विभिन्न गांवों में भी पर्व को लेकर खास उत्साह रहा। घरों के आंगन में पारंपरिक अरिपन बनाए गए। महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजा की तैयारी की और परिवार के बच्चों तथा बुजुर्गों ने भी पर्व में भाग लिया। चंद्रमा के दर्शन के समय कई घरों में श्रद्धा का माहौल देखने को मिला।
पंडित अजीत बाबा ने बताया चौरचन का धार्मिक महत्व
पंडित अजीत बाबा ने बताया कि चौरचन केवल चंद्रमा की पूजा का पर्व नहीं, बल्कि मिथिला और आसपास के क्षेत्रों की समृद्ध लोक परंपरा, पारिवारिक संस्कार और धार्मिक आस्था का प्रतीक है। भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश की पूजा के साथ चंद्रदेव की आराधना करने की परंपरा है। उन्होंने कहा कि पूजा में श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा का विशेष महत्व है। महिलाएं दिनभर व्रत रखकर शाम को अरिपन बनाती हैं, डाली में ठेकुआ, फल, पकवान और अन्य नैवेद्य सजाती हैं तथा मिट्टी के पात्र में जमाए गए दही को भी पूजा में शामिल करती हैं।
उन्होंने कहा कि पूजा के समय प्रचलित मंत्र का उच्चारण कर चंद्रमा को अर्घ्य देने और हाथ में फल लेकर दर्शन करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में इसे मिथ्या कलंक से मुक्ति और परिवार के कल्याण से जोड़ा गया है। पंडित अजीत बाबा ने कहा कि ऐसे पर्व हमारी लोक संस्कृति और पारिवारिक परंपराओं को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का भी महत्वपूर्ण माध्यम हैं।
नई पीढ़ी को परंपरा से जोड़ रहा पर्व
चौरचन पर्व की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पूजा-पद्धति के साथ-साथ लोक संस्कृति भी जीवंत नजर आई। बच्चों ने जहां पूजा की तैयारियों में परिवार के सदस्यों का सहयोग किया, वहीं बुजुर्गों ने उन्हें पर्व की कथा और परंपराओं के बारे में जानकारी दी। ठेकुआ, फल, खीर, दही और अन्य पारंपरिक प्रसाद की तैयारी से घरों में पर्व का विशेष वातावरण बना रहा।
गणेश चतुर्थी के साथ मनाए जाने वाले चौरचन पर्व ने नवगछिया क्षेत्र में एक बार फिर धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक और सांस्कृतिक एकजुटता का संदेश दिया। शाम ढलने के साथ जब चंद्रमा का दर्शन हुआ तो महिलाओं ने पूजा-अर्चना कर अर्घ्य दिया और परिवार के सदस्यों ने फल हाथ में लेकर चंद्रदेव को प्रणाम किया। इसके बाद प्रसाद ग्रहण कर लोगों ने पर्व का समापन किया। इस वर्ष 14 सितंबर 2026 को गणेश चतुर्थी और चौरचन पर्व का आयोजन हुआ।












