


हरी फसल डूबने से चारे का संकट गहराया, दूर-दराज के क्षेत्रों से घास लाने को मजबूर पशुपालक; चारे से लदी गाड़ियों पर जोखिम उठाकर सफर कर रहे ग्रामीण
मुरलीधर झा

नवगछिया। लगातार हुई बारिश और बाढ़ के कारण रंगरा, गोपालपुर तथा इस्माइलपुर प्रखंड के बाढ़ प्रभावित गांवों में भले ही पानी का स्तर कम होने लगा है, लेकिन ग्रामीणों की मुश्किलें अभी समाप्त नहीं हुई हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद अब पशुपालकों के सामने पशुओं के लिए चारे का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। खेतों में लगी हरी फसल लंबे समय तक पानी में डूबी रहने के कारण खराब हो गई है। इससे स्थानीय स्तर पर पशुओं के लिए हरा चारा उपलब्ध नहीं हो पा रहा है।
चारे की कमी के कारण पशुपालकों को अब दूसरे इलाकों का रुख करना पड़ रहा है। ग्रामीण दूर-दराज के क्षेत्रों से घास और अन्य पशु चारा काटकर जुगाड़ गाड़ी तथा ट्रैक्टर-ट्रॉली के माध्यम से गांव तक ला रहे हैं। जगतपुर, खगड़ा सहित आसपास के अन्य इलाकों से बड़ी मात्रा में चारा लाकर बाढ़ प्रभावित गांवों में पहुंचाया जा रहा है। चारे की व्यवस्था के लिए पशुपालकों को अतिरिक्त समय और आर्थिक खर्च भी उठाना पड़ रहा है।

चारे के ऊपर बैठकर लौट रहे ग्रामीण
चारा लाने के दौरान कई जगहों पर लोगों की मजबूरी और जोखिम भी सामने आ रहा है। चारे से लदी जुगाड़ गाड़ियों और ट्रैक्टर-ट्रॉलियों पर बड़ी संख्या में महिला और पुरुष बैठकर गांव लौट रहे हैं। कई वाहनों पर चारे के ऊपर ही 20 से 24 तक लोग सवार दिखाई दे रहे हैं। इस तरह का सफर कभी भी दुर्घटना का कारण बन सकता है। चारे के साथ लोगों के सवार होने से वाहन का संतुलन बिगड़ने की आशंका भी बनी रहती है।
ग्रामीणों का कहना है कि स्थानीय स्तर पर चारा उपलब्ध नहीं होने के कारण उन्हें मजबूरी में दूसरे क्षेत्रों में जाना पड़ रहा है। चारा लाने के लिए पर्याप्त परिवहन साधन उपलब्ध नहीं होने के कारण एक ही वाहन में अधिक संख्या में लोगों को बैठकर वापस लौटना पड़ता है। ग्रामीणों ने प्रशासन से पशुपालकों के लिए पर्याप्त मात्रा में पशु चारे की व्यवस्था कराने की मांग की है।
बाढ़ से हरी फसल हुई बर्बाद
बाढ़ और लगातार हुई बारिश का सबसे अधिक असर खेतों में लगी हरी फसलों पर पड़ा है। लंबे समय तक खेतों में पानी जमा रहने के कारण घास और अन्य हरी फसलें नष्ट हो गई हैं। जिन खेतों से सामान्य दिनों में पशुपालकों को आसानी से चारा मिल जाता था, वहां अब कीचड़ और पानी के कारण चारा उपलब्ध नहीं है। इससे छोटे और सीमांत पशुपालकों की परेशानी विशेष रूप से बढ़ गई है।
पशुपालकों के लिए दोहरी परेशानी
बाढ़ के दौरान पशुओं को सुरक्षित स्थान पर रखना और उनके लिए भोजन की व्यवस्था करना बड़ी चुनौती बनी हुई थी। अब पानी उतरने के बाद भी पशुओं के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध नहीं होने से पशुपालकों की परेशानी जारी है। कई परिवारों के लिए पशुपालन आय का प्रमुख साधन है। ऐसे में चारे की कमी का सीधा असर उनके पशुपालन पर पड़ सकता है।
कम्युनिटी किचन बंद होने से भी बढ़ी परेशानी
बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में चल रहा सामुदायिक रसोईघर भी रविवार से बंद हो गया है। इससे बाढ़ प्रभावित परिवारों की परेशानी और बढ़ गई है। ग्रामीणों का कहना है कि बाढ़ का पानी उतरने के बावजूद प्रभावित क्षेत्रों में सामान्य स्थिति पूरी तरह बहाल नहीं हुई है। ऐसे में राहत व्यवस्था को अचानक समाप्त करने के बजाय प्रभावित परिवारों की वास्तविक स्थिति का आकलन कर आवश्यक सहायता जारी रखने की जरूरत है।
प्रशासन के सामने चारा उपलब्ध कराने की चुनौती
बाढ़ का पानी कम होने के बाद अब प्रशासन के सामने पशुपालकों के लिए पर्याप्त चारा उपलब्ध कराने की चुनौती है। यदि स्थानीय स्तर पर जल्द चारे की व्यवस्था नहीं की गई तो पशुपालकों को इसी तरह दूर-दराज के क्षेत्रों पर निर्भर रहना पड़ेगा। साथ ही चारा लाने वाली गाड़ियों पर बड़ी संख्या में लोगों के सवार होने से दुर्घटना का खतरा भी बना रहेगा।
ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन प्रभावित पंचायतों में पशुओं के लिए पर्याप्त मात्रा में हरा एवं सूखा चारा उपलब्ध कराए और चारा ढोने के लिए सुरक्षित परिवहन की व्यवस्था सुनिश्चित करे। इससे पशुपालकों को दूर-दराज के इलाकों में जाने की मजबूरी कम होगी और जोखिम भरे तरीके से चारा लाने की स्थिति से भी बचा जा सकेगा।
















