5
(2)

@ भागलपुर के महाशय ड्योढ़ी में गंगा तट पर हुआ ‘बोधन घाट’ अनुष्ठान, ढाक-ढोल की गूंज के बीच मां दुर्गा के जागरण का आह्वान।

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। देशभर में जहां श्रद्धालु शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा की प्रतीक्षा करते हैं, वहीं भागलपुर की धार्मिक-सांस्कृतिक धरती पर मां दुर्गा की आराधना की एक ऐसी प्राचीन परंपरा आज भी जीवंत है, जिसकी शुरुआत मुख्य दुर्गा पूजा से करीब एक सप्ताह पहले होती है। बंगाली समाज की यह विशिष्ट परंपरा 400 वर्षों से अधिक समय से महाशय ड्योढ़ी में निभाई जा रही है।

CREATOR: gd-jpeg v1.0 (using IJG JPEG v62), default quality?

नाथनगर प्रखंड के चंपानगर स्थित महाशय ड्योढ़ी, दुर्गा मंदिर, दुर्गा बाड़ी, काली बाड़ी और सरकार बाड़ी में बंगाली रीति-रिवाजों के अनुसार होने वाली पूजा श्रद्धा और आस्था का केंद्र बनी हुई है। इस वर्ष भी रविवार से ‘बोधन घाट’ के धार्मिक अनुष्ठान के साथ मां दुर्गा के जागरण का विधिवत आह्वान किया गया। यह धार्मिक अनुष्ठान विजयादशमी तक चलेगा।

‘बोधन’ यानी मां शक्ति का जागरण:

पूजा समिति से जुड़े भक्त देबाशीष बनर्जी के अनुसार, ‘बोधन’ का अर्थ है जागरण। धार्मिक मान्यता के अनुसार दक्षिणायन के दौरान देव-देवियां विश्राम अवस्था में माने जाते हैं। ऐसे में दुर्गा पूजा से पूर्व विशेष विधि-विधान के माध्यम से मां दुर्गा का आह्वान कर उन्हें जागृत किया जाता है।मान्यता है कि भगवान श्रीराम ने भी रावण पर विजय प्राप्त करने से पहले मां दुर्गा की आराधना के लिए उनका अकाल जागरण किया था। इसी कारण इस परंपरा को ‘अकाल बोधन’ भी कहा जाता है। श्रद्धालुओं के लिए यह अनुष्ठान केवल पूजा की शुरुआत नहीं, बल्कि शक्ति, भक्ति और विजय के लिए मां भगवती के आशीर्वाद का आह्वान माना जाता है।

गंगा तट तक निकली आस्था की शोभायात्रा:

बोधन घाट के अवसर पर महाशय ड्योढ़ी से गंगा तट स्थित बंगाली टोला घाट तक धार्मिक शोभायात्रा निकाली गई। ढोल और पारंपरिक बंगाली ‘ढाक’ की गूंज से वातावरण भक्तिमय हो उठा।गंगा तट पर विधि-विधान से पूजा-अर्चना के बाद पवित्र गंगाजल को कलश में भरा गया। धार्मिक अनुष्ठान के बाद इस कलश को बेल वृक्ष के नीचे रखा गया, जिसके पश्चात इसे वापस मंदिर लाकर मां दुर्गा की पूजा और आरती की गई।

अकबर के शासनकाल से जुड़ी है परंपरा:

महाशय ड्योढ़ी की दुर्गा पूजा का इतिहास मुगल सम्राट अकबर के शासनकाल तक जाता है। बताया जाता है कि उस समय श्रीराम घोष, जो ‘कानूनगो’ यानी राजस्व अधिकारी थे और महाशय ड्योढ़ी के स्वामी थे, उन्होंने अपने परिसर में दुर्गा पूजा और काली पूजा की शुरुआत की थी। तब से उनके वंशज इस धार्मिक परंपरा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाते आ रहे हैं। चार शताब्दियों से अधिक समय बाद भी पूजा की मूल परंपराओं और धार्मिक विधानों को संरक्षित रखा गया है।

आकाश में उछाली जाती हैं कौड़ियां, समृद्धि की कामना:

महाशय तारकनाथ घोष ट्रस्ट के अध्यक्ष डॉ. अरविंद घोष के अनुसार, बोधन के दौरान एक विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी होता है, जिसमें कौड़ी के खोल आकाश में उछाले जाते हैं और श्रद्धालु उन्हें पाने का प्रयास करते हैं।

ट्रस्ट से जुड़े लोगों के अनुसार, कौड़ियों को भगवान धन कुबेर का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक विश्वास है कि इन्हें प्राप्त करना समृद्धि, सौभाग्य और सकारात्मक ऊर्जा से जुड़ा है तथा यह नकारात्मक शक्तियों से रक्षा का प्रतीक भी माना जाता है।

ढाक की मंगलध्वनि, गंगा की पवित्र धारा और मां भगवती के जागरण के बीच भागलपुर की यह चार सौ वर्ष पुरानी परंपरा आज भी यह संदेश देती है कि आस्था की ज्योति पीढ़ियां बदलने के बाद भी उसी श्रद्धा के साथ प्रज्वलित रह सकती है।

Aapko Yah News Kaise Laga.

Click on a star to rate it!

Average rating 5 / 5. Vote count: 2

No votes so far! Be the first to rate this post.

Share: