
बेंच से बेंचमार्क तक
गांव की बेंच से वैश्विक पहचान तक का सफर: इं. (डॉ.) अंशु सिंह की प्रेरक गाथा
पिता का साया छूटा, आर्थिक कठिनाइयों ने घेरा, अनुकंपा की नौकरी ठुकराई; ट्यूशन पढ़ाकर पूरी की इंजीनियरिंग की पढ़ाई। आज शिक्षा, योग और अध्यात्म के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले इं. (डॉ.) अंशु सिंह की कहानी संघर्ष, संकल्प और समाज के लिए कुछ कर गुजरने की अदम्य इच्छाशक्ति की कहानी है।

किसी व्यक्ति की महानता का आकलन केवल उसकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन परिस्थितियों से भी होता है, जिन्हें पार करके उसने अपनी मंजिल हासिल की। भागलपुर जिले के छोटे से गांव ताड़र से निकलकर शिक्षा, योग और अध्यात्म के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वाले इं. (डॉ.) अंशु सिंह की जीवनयात्रा इसी विचार को साकार करती है।
उनकी कहानी उस विश्वास की कहानी है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती, सपनों की कोई भौगोलिक सीमा नहीं होती और परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, दृढ़ संकल्प के सामने रास्ते निकल ही आते हैं।
गांव की बेंच से शुरू हुआ सफर
अंशु सिंह बचपन से ही मेधावी छात्र रहे। उनकी प्रारंभिक शिक्षा कक्षा एक से सात तक अपने गांव ताड़र में हुई। राष्ट्रीय ग्रामीण छात्रवृत्ति परीक्षा में चयनित होने के बाद उन्हें कक्षा आठ से दसवीं तक जिला स्कूल, भागलपुर में पढ़ने का अवसर मिला।

लेकिन जीवन ने किशोरावस्था में ही उनकी परीक्षा लेनी शुरू कर दी।
ग्यारहवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान उनके पिता का निधन हो गया। जिस उम्र में बच्चे अपने भविष्य के सपने बुनते हैं, उस उम्र में अंशु सिंह के सामने पारिवारिक जिम्मेदारियों और आर्थिक संकट की चुनौती खड़ी हो गई।
उन्हें अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिलने का अवसर था। वे चाहते तो तत्काल नौकरी स्वीकार कर आर्थिक सुरक्षा का रास्ता चुन सकते थे, लेकिन उनके भीतर शिक्षा प्राप्त करने और जीवन में कुछ बड़ा करने की आकांक्षा थी। उन्होंने नौकरी के विकल्प को ठुकराकर अपनी पढ़ाई जारी रखने का कठिन निर्णय लिया।
आर्थिक कठिनाइयों के बीच ट्यूशन पढ़ाकर उन्होंने अपनी शिक्षा का खर्च जुटाया। संघर्ष के इसी दौर ने उनके भीतर आत्मनिर्भरता, अनुशासन और विपरीत परिस्थितियों में भी आगे बढ़ते रहने का साहस पैदा किया।
आखिरकार, उन्होंने भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई डिस्टिंक्शन के साथ पूरी की।
यह केवल एक शैक्षणिक उपलब्धि नहीं थी, बल्कि उन परिस्थितियों पर विजय थी, जो किसी भी सामान्य व्यक्ति को अपने सपनों से समझौता करने के लिए मजबूर कर सकती थीं।
आईएएस का सपना अधूरा रहा, लेकिन उद्देश्य नहीं
इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी करने के बाद अंशु सिंह भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाने का सपना लेकर दिल्ली पहुंचे। उनकी इच्छा व्यापक स्तर पर समाज और देश के लिए काम करने की थी। लेकिन अस्वस्थता के कारण उन्हें अपनी योजना बदलनी पड़ी।
जीवन में कभी-कभी परिस्थितियां हमारी मंजिल तक पहुंचने का रास्ता बदल देती हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हमारा उद्देश्य समाप्त हो जाता है।
अंशु सिंह ने भी परिस्थितियों के सामने हार नहीं मानी। उन्होंने अपने ज्ञान और अनुभव को शिक्षा के क्षेत्र में लगाने का निर्णय लिया। वे समझ चुके थे कि समाज में परिवर्तन लाने के अनेक रास्ते हैं और शिक्षा उनमें सबसे प्रभावशाली माध्यमों में से एक है।
यहीं से एक नए अध्याय की शुरुआत हुई।
टेक्नो प्वाइंट : हजारों सपनों को उड़ान
वर्ष 1996 में अंशु सिंह ने भागलपुर में टेक्नो प्वाइंट कोचिंग की स्थापना की। उनका उद्देश्य था कि छोटे शहरों और सामान्य आर्थिक पृष्ठभूमि से आने वाले विद्यार्थियों को भी IIT-JEE, मेडिकल तथा अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए गुणवत्तापूर्ण मार्गदर्शन मिल सके।
उस दौर में राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए महानगरों की ओर जाना अनेक विद्यार्थियों की मजबूरी थी। अंशु सिंह ने भागलपुर में ही बेहतर शैक्षणिक अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास किया।
वर्षों के समर्पण और शिक्षण के प्रति प्रतिबद्धता का परिणाम यह हुआ कि टेक्नो प्वाइंट से पढ़कर हजारों छात्र-छात्राओं ने IIT-JEE, मेडिकल और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में सफलता प्राप्त की। अनेक विद्यार्थी आज देश-विदेश में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं और विभिन्न क्षेत्रों में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
एक शिक्षक के लिए इससे बड़ी उपलब्धि क्या हो सकती है कि उसके विद्यार्थी उससे आगे बढ़कर अपने परिवार, समाज और देश का नाम रोशन करें?
टेक्नो मिशन इंटरनेशनल स्कूल : शिक्षा के माध्यम से समाज निर्माण
प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने के साथ अंशु सिंह की दृष्टि गुणवत्तापूर्ण स्कूली शिक्षा के विस्तार पर भी थी।
इसी उद्देश्य से वर्ष 2003 में उन्होंने टेक्नो मिशन इंटरनेशनल स्कूल की स्थापना की। इस महत्वपूर्ण यात्रा में उनकी पत्नी ने उनका साथ दिया। पारिवारिक सहयोग, साझा संकल्प और निरंतर परिश्रम ने संस्थान की विकास यात्रा को आगे बढ़ाया।
वर्ष 2011 में विद्यालय को CBSE की मान्यता प्राप्त हुई।
उनका मानना रहा है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल परीक्षा में अच्छे अंक प्राप्त करना नहीं, बल्कि बच्चों को आत्मविश्वासी, अनुशासित, संवेदनशील और जिम्मेदार नागरिक बनाना भी है।
शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान इस विश्वास पर आधारित है कि किसी विद्यार्थी की आर्थिक स्थिति उसके सपनों की सीमा तय नहीं करनी चाहिए।
टेक्नो प्वाइंट से लेकर टेक्नो मिशन इंटरनेशनल स्कूल तक की यात्रा इसी सोच का विस्तार है—शिक्षा को अवसर, आत्मविश्वास और सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाना।
अध्यात्म से जुड़ाव : बाहरी सफलता से आंतरिक विकास तक
वर्ष 2006 से अंशु सिंह का जुड़ाव अध्यात्म के क्षेत्र में गहरा होने लगा। उन्होंने जीवन के बाहरी लक्ष्यों के साथ आंतरिक शांति, आत्मबोध और मानवीय मूल्यों के महत्व को भी समझने का प्रयास किया।
धीरे-धीरे अध्यात्म उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया। उन्होंने देश-विदेश में आचार्य के रूप में आध्यात्मिक सत्रों का संचालन किया और लोगों को आत्मचिंतन, साधना तथा जीवन में संतुलन की दिशा में प्रेरित किया।
उनकी दृष्टि में जीवन की सार्थकता केवल व्यक्तिगत सफलता में नहीं, बल्कि स्वयं के विकास के साथ दूसरों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने में भी है।
यही सोच आगे चलकर योग और ध्यान के क्षेत्र में उनके सक्रिय योगदान का आधार बनी।
कोरोना काल में योग की ओर नई पहल
कोरोना महामारी के दौरान दुनिया ने स्वास्थ्य, मानसिक शांति और जीवनशैली के महत्व को नए सिरे से महसूस किया। अंशु सिंह ने इस समय को सीखने और स्वयं को विकसित करने के अवसर के रूप में लिया।
उन्होंने योग का विधिवत अध्ययन किया और आयुष मंत्रालय से संबंधित निर्धारित योग-प्रशिक्षण पूरा कर योग प्रशिक्षक के रूप में अपनी भूमिका विकसित की।
उनका विश्वास है कि योग केवल शारीरिक अभ्यास नहीं, बल्कि शरीर, मन और जीवनशैली के बीच संतुलन स्थापित करने का माध्यम है।
इसी विचार को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने के उद्देश्य से उन्होंने टेक्नो स्कूल ऑफ योग की स्थापना की। योग, ध्यान और भारतीय ज्ञान परंपरा को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाना उनके प्रयासों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
सिद्धार्थ योगपीठ : योग, साधना और जीवन परिवर्तन की दिशा
वर्तमान में अंशु सिंह सिद्धार्थ योगपीठ के निदेशक के रूप में योग, ध्यान, साधना और व्यक्तित्व विकास के क्षेत्र में अपने प्रयासों को आगे बढ़ा रहे हैं।
उनकी दृष्टि में आधुनिक शिक्षा और भारतीय ज्ञान परंपरा के बीच समन्वय स्थापित करना समय की आवश्यकता है। विज्ञान और तकनीक मनुष्य को बाहरी संसार को समझने में सहायता देते हैं, जबकि योग और अध्यात्म उसे स्वयं को समझने और जीवन में संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा देते हैं।
सिद्धार्थ योगपीठ के माध्यम से उनकी परिकल्पना योग और ध्यान को जनसामान्य तक पहुंचाने तथा लोगों को स्वस्थ, जागरूक और संतुलित जीवन की ओर प्रेरित करने की है।
शिक्षा और योग को एक-दूसरे का पूरक मानने वाली उनकी सोच उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को दर्शाती है।
भारतीय योग को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी
अंशु सिंह वर्तमान में इंडियन योग एसोसिएशन, बिहार चैप्टर के वाइस चेयरमैन के रूप में भी अपनी भूमिका निभा रहे हैं।
यह दायित्व योग के क्षेत्र में उनके सक्रिय जुड़ाव और अनुभव को व्यापक मंच प्रदान करता है। उनका प्रयास योग की परंपरा, प्रशिक्षण और जनजागरूकता को आगे बढ़ाने के साथ इसे लोगों की दैनिक जीवनशैली का हिस्सा बनाने की दिशा में काम करना है।
योग को केवल किसी एक वर्ग तक सीमित न रखकर विद्यार्थियों, युवाओं, महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और कामकाजी लोगों तक पहुंचाना उनके व्यापक दृष्टिकोण का हिस्सा है।
उनकी यह यात्रा शिक्षा से योग और व्यक्तिगत विकास से सामाजिक जागरूकता तक निरंतर विस्तार की कहानी है।
वैश्विक मंच पर सम्मान : दुबई का इंस्पिरेशनल लीडर अवार्ड
अंशु सिंह की जीवनयात्रा में वर्ष 2024 एक उल्लेखनीय पड़ाव रहा, जब उन्हें दुबई में Inspirational Leader Award से सम्मानित किया गया।
इसके अतिरिक्त, अमेरिका के मैरीलैंड विश्वविद्यालय से उन्हें मानद पीएचडी की उपाधि प्राप्त हुई।
ये सम्मान उनकी यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं। इनके पीछे उस लंबे संघर्ष को भी देखना चाहिए, जिसकी शुरुआत गांव के एक साधारण विद्यार्थी के रूप में हुई थी।
एक ऐसा विद्यार्थी, जिसने पिता को खोने के बाद भी पढ़ाई नहीं छोड़ी; आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद इंजीनियरिंग की पढ़ाई पूरी की; अपने सपनों का रास्ता बदलने के बाद भी आगे बढ़ना जारी रखा और फिर शिक्षा, योग तथा अध्यात्म के क्षेत्र में अपनी भूमिका विकसित की।
उनकी कहानी का वास्तविक महत्व केवल सम्मान प्राप्त करने में नहीं, बल्कि उन अनुभवों में है, जिन्होंने उन्हें निरंतर सीखने और आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
IIT पटना से MBA : सीखने की कोई उम्र नहीं होती
वर्ष 2026 में अंशु सिंह ने IIT पटना से MBA की पढ़ाई पूरी की।
इंजीनियरिंग की शिक्षा, दशकों का शैक्षणिक अनुभव और योग-अध्यात्म के क्षेत्र में सक्रियता के बावजूद प्रबंधन की पढ़ाई पूरी करना उनके निरंतर सीखते रहने के संकल्प को दर्शाता है।
यह उपलब्धि युवाओं के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी प्रेरणा है, जो किसी निश्चित उम्र के बाद सीखने की प्रक्रिया को समाप्त मान लेते हैं।
उनकी यात्रा बताती है कि अनुभव का वास्तविक मूल्य तभी बढ़ता है, जब व्यक्ति नए विचारों को सीखने, अपनी समझ को विस्तार देने और बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को विकसित करने के लिए तैयार रहता है।
विश्वविद्यालय की परिकल्पना : सपनों का अगला पड़ाव
शिक्षा, विद्यालय संचालन, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी और योग के क्षेत्र में अपने अनुभवों के आधार पर अंशु सिंह अब एक व्यापक शैक्षणिक परिकल्पना की दिशा में भी सोच रहे हैं।
उनका सपना ऐसी व्यवस्था विकसित करने का है, जिसमें आधुनिक शिक्षा, कौशल विकास, योग, ध्यान, नैतिक मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा का समन्वय हो।
विश्वविद्यालय की स्थापना की उनकी परिकल्पना इसी दूरदृष्टि का हिस्सा है। इसका उद्देश्य भविष्य की पीढ़ियों के लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और विकास के व्यापक अवसर तैयार करना है।
यह एक ऐसी परिकल्पना है, जिसके साकार होने के लिए दीर्घकालीन योजना, संसाधन और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होगी। लेकिन हर बड़ी उपलब्धि की शुरुआत एक विचार और उसे साकार करने के संकल्प से ही होती है।
अपनी मिट्टी से प्रेम : गांव ताड़र के प्रति समर्पण
जीवन में आगे बढ़ने के बाद अपनी जड़ों को याद रखना किसी भी व्यक्ति के व्यक्तित्व का महत्वपूर्ण पक्ष होता है।
अंशु सिंह के लिए ताड़र केवल उनका जन्मस्थान नहीं, बल्कि उनकी पहचान और संघर्ष की पहली पाठशाला है।
अपने गांव में भव्य दुर्गा मंदिर और काली मंदिर के निर्माण में उनका योगदान अपनी जन्मभूमि के प्रति उनके भावनात्मक, सांस्कृतिक और सामाजिक जुड़ाव को दर्शाता है।
जिस गांव की मिट्टी में उनके सपनों ने आकार लिया, उस गांव से उनका जुड़ाव उनकी जीवनयात्रा का एक महत्वपूर्ण पहलू है।
यह हमें याद दिलाता है कि व्यक्ति चाहे कितनी भी ऊंचाई प्राप्त कर ले, अपनी जड़ों से जुड़ाव उसे अपनी पहचान और जीवन के मूल्यों की याद दिलाता रहता है।
बेंच से बेंचमार्क तक : एक प्रेरणा, जो आगे बढ़ने का साहस देती है
इं. (डॉ.) अंशु सिंह की कहानी किसी चमत्कार की कहानी नहीं है। यह निरंतर परिश्रम, कठिन निर्णयों, असफलताओं से उबरने और बदलती परिस्थितियों में नए रास्ते तलाशने की कहानी है।
पिता के निधन के बाद आर्थिक संघर्ष से जूझते एक विद्यार्थी से लेकर इंजीनियर, शिक्षाविद्, विद्यालय संस्थापक, योग प्रशिक्षक, आध्यात्मिक आचार्य और विभिन्न संस्थाओं में नेतृत्वकारी भूमिका निभाने वाले व्यक्तित्व तक की उनकी यात्रा अनेक अनुभवों से होकर गुजरी है।
उन्होंने अपने जीवन में देखा कि कठिन परिस्थितियां मनुष्य की राह अवश्य कठिन बना सकती हैं, लेकिन उसका संकल्प उससे भी अधिक शक्तिशाली हो सकता है।
उनकी यात्रा का सबसे बड़ा संदेश यही है कि सफलता का अर्थ केवल स्वयं आगे बढ़ना नहीं, बल्कि अपने अनुभव, ज्ञान और सामर्थ्य से दूसरों के लिए भी अवसर तैयार करना है।
आज जब अनेक युवा सीमित संसाधनों, आर्थिक कठिनाइयों और अनिश्चित भविष्य के कारण अपने सपनों को छोटा कर लेते हैं, तब ऐसी जीवनगाथाएं उन्हें अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचानने की प्रेरणा देती हैं।
गांव की बेंच पर बैठकर शुरू हुआ सफर आज शिक्षा, योग, अध्यात्म और समाज निर्माण के अनेक आयामों तक पहुंच चुका है। यह सफर केवल एक व्यक्ति की उपलब्धियों का विवरण नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रतीक है कि साधारण परिस्थितियों में जन्म लेकर भी असाधारण उद्देश्य के लिए जीवन समर्पित किया जा सकता है।
इं. (डॉ.) अंशु सिंह की जीवनयात्रा हमें यही प्रेरणा देती है—
“अपनी परिस्थितियों को अपनी पहचान मत बनने दीजिए। अपनी मेहनत को अपनी शक्ति बनाइए, अपने ज्ञान को दूसरों की प्रगति का माध्यम बनाइए और अपनी सफलता को समाज के लिए सार्थक बनाइए।”
यही है बेंच से बेंचमार्क तक का सफर—संघर्ष से सफलता तक, सफलता से सेवा तक और व्यक्तिगत सपनों से समाज के व्यापक भविष्य की ओर।















