
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। भागलपुर से मिर्जाचौकी तक NH-80 के 81 किलोमीटर लंबे फोरलेन निर्माण कार्य की रफ्तार पर सवाल खड़े होने लगे हैं। एक तरफ करोड़ों रुपये की लागत से सड़क और पुल-पुलियों का निर्माण हो रहा है, तो दूसरी तरफ कहलगांव का बेहद महत्वपूर्ण और वर्ष 1960 में निर्मित कोआ पुल इस परियोजना में शामिल ही नहीं किया गया। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्या उस समय के जनप्रतिनिधियों ने इस गंभीर मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया या फिर NHAI के इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाने की जरूरत ही नहीं समझी? इधर जब पथ निर्माण मंत्री ने विभागीय अधिकारियों के साथ स्थल निरीक्षण के बाद जर्जर कुआ पुल पर आवाजाही बंद करने की घोषणा करते हुए मरम्मत का कार्य शुरू किया गया तो विरोध का स्वर मुखर हो उठा।
इतना ही नहीं, कहलगांव शहर के आसपास अतिक्रमण हटाने के लिए बुलडोजर तो चला, लेकिन सड़क निर्माण के दौरान NH-80 के मानकों के अनुरूप काम नहीं हुआ। आम लोगों की शिकायत पर जिलाधिकारी ने स्वयं स्थल का निरीक्षण भी किया। लेकिन निरीक्षण के बाद जिला मुख्यालय लौटते ही दो टूक कह दिया गया कि यहां अतिक्रमण नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब NH-80 को फोरलेन के मानकों के अनुरूप विकसित किया जा रहा था, तब कोआ पुल के चौड़ीकरण की योजना क्यों नहीं बनाई गई? शारदा पाठशाला से स्टेशन चौक तक अधिकारियों को

अतिक्रमण क्यों नहीं दिखा? क्या यह महज विभागीय चूक थी या इसके पीछे कोई बड़ी अनदेखी? क्या कहलगांव को विकास की मुख्यधारा से काटकर एक तरह से टापू बनाने की मंशा है? इन सवालों का जवाब संबंधित विभाग और उस समय के जनप्रतिनिधियों को देना चाहिए। इस बड़ी अनदेखी पर सांसद सहित स्थानीय विधायक को सवाल उठाना ही पड़ेगा।
जीरोमाइल (भागलपुर) से मिर्जाचौकी तक 81 किलोमीटर लंबे फोरलेन प्रोजेक्ट का काम TTC इंफ्रास्ट्रक्चर के जिम्मे है। इस परियोजना में भागलपुर से पीरपैंती तक का हिस्सा भी शामिल है।2 जुलाई 2026 की NHAI समीक्षा रिपोर्ट के मुताबिक, परियोजना का लगभग 30 प्रतिशत काम अब भी शेष था। मुख्य अभियंता संजय कुमार भारती ने जून 2026 तक काम पूरा करने की समयसीमा निर्धारित की थी, लेकिन अतिक्रमण और निर्माण एजेंसी की धीमी कार्यशैली के कारण अब लगभग एक वर्ष अतिरिक्त लगने का अनुमान जताया जा रहा है।
आधिकारिक DPR के अनुसार, पूरे 81 किलोमीटर के स्ट्रेच में 25 से अधिक पुल-पुलियों का प्रावधान है। भागलपुर-पीरपैंती वाले हिस्से में प्रमुख निर्माण कार्यों की स्थिति इस प्रकार बताई जा रही है। इंग्लिश फरका पुल, मसाढ़ू पुल, घोषपुर पुल,एक अन्य बड़ा पुल। इन पुलों का मुख्य निर्माण पूरा बताया जा रहा है, लेकिन अप्रोच रोड का काम अब भी बाकी है।कहलगांव-शिवनारायणपुर के बीच भगेय नाला पर पांच मुहिया पुल का निर्माण जारी है। इसके पूरा होने से इस क्षेत्र में आवागमन को राहत मिलने की उम्मीद है। कलकीगंज ईंट भट्ठा, जखबाबा स्थान, श्मशान घाट और कहलगांव बस स्टैंड सहित सबौर-कहलगांव के बीच लगभग 10-12 छोटी पुलियों का निर्माण पूरा बताया जा रहा है। हालांकि, कई स्थानों पर सुरक्षा दीवार और नाला कनेक्शन का काम अब भी अधूरा है।
कहलगांव का कोआ नाला पुल वर्ष 1960 में बना था। इसे NH-80 के इस फोरलेन प्रोजेक्ट में शामिल नहीं किया गया। आज स्थिति यह है कि जर्जर हालत के कारण यह पुल करीब तीन महीने से बंद है। पुल को लेकर राजनीतिक सरगर्मी भी कम नहीं रही। भूख हड़ताल से लेकर लंबी राजनीतिक बयानबाजी तक हुई। भूख हड़ताल के बाद त्रिपक्षीय वार्ता हुई और सशर्त हल्के वाहनों की आवाजाही शुरू कराने की व्यवस्था की गई।
उपलब्ध निर्माण विवरण के अनुसार, भागलपुर-पीरपैंती के बीच लगभग 15-17 प्रमुख और छोटे स्ट्रक्चर का निर्माण या पुनर्निर्माण इस ठेके में शामिल है। इनमें चार बड़े पुल, भगेय नाला पर पांच मुहिया पुल और लगभग 10-12 छोटी पुलियां शामिल हैं। जब इतने बड़े स्तर पर पुल-पुलियों का निर्माण और पुनर्निर्माण किया जा रहा है, तो कोआ पुल को परियोजना से बाहर रखने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? क्या DPR तैयार करते समय इस पुल की उम्र, स्थिति और भविष्य की यातायात जरूरतों का आकलन नहीं किया गया था?
NH-80 केवल एक सड़क नहीं, बल्कि भागलपुर, कहलगांव, पीरपैंती के हजारों लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी, व्यापार, चिकित्सा और आवागमन की जीवनरेखा है।कहलगांव की जनता को आश्वासन नहीं, जवाब चाहिए। विकास के नाम पर सड़क तो फोरलेन हो जाए, लेकिन शहर का महत्वपूर्ण संपर्क पुल जर्जर हालत में पड़ा रहे, तो ऐसी विकास योजना पर सवाल उठना लाजिमी है।
















