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बीएयू सबौर एवं कृषि वैज्ञानिकों ने शुरू की विशेष निगरानी

भागलपुर : बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर द्वारा लीची की फसल में एक उभरते हुए आक्रामक कीट “लीची स्टिंक बग” के प्रकोप की पुष्टि की गई है। वैज्ञानिकों के अनुसार यह कीट बिहार सहित लीची उत्पादन वाले क्षेत्रों के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। इस कीट का वैज्ञानिक नाम टेसारोटोमा जावानिका बताया गया है।


कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यह कीट लीची के कोमल शाखाओं, पुष्प गुच्छों तथा विकसित हो रहे फलों से रस चूसकर नुकसान पहुंचाता है। इसके निम्फ और वयस्क दोनों अवस्थाएं पौधों की टहनियों को सुखाने, पुष्प मंजरियों को झुलसाने तथा समय से पहले फल गिराने का कारण बनती हैं। इसके प्रभाव से फलों की सतह पर काले धब्बे बन जाते हैं और उत्पादन के साथ-साथ गुणवत्ता पर भी गंभीर असर पड़ता है।

लीची उत्पादन पर संभावित खतरे को देखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, बिहार कृषि विश्वविद्यालय सबौर तथा डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों की संयुक्त तकनीकी कार्यबल टीम गठित की गई है। इस टीम का उद्देश्य वैज्ञानिक निगरानी, क्षेत्रवार अध्ययन तथा समेकित कीट प्रबंधन रणनीति विकसित करना है।


बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर से डॉ. तारक नाथ गोस्वामी को इस विशेषज्ञ टीम का सदस्य बनाया गया है। डॉ. ए.के. सिंह एवं डॉ. किरण कुमारी के मार्गदर्शन में डॉ. गोस्वामी तथा उनके छात्र दीपक कुमार द्वारा भागलपुर जिले के विभिन्न लीची उत्पादक क्षेत्रों में व्यापक सर्वेक्षण एवं निगरानी अभियान चलाया गया।

सर्वेक्षण के दौरान सबौर विश्वविद्यालय परिसर स्थित उद्यानिकी बागान में लीची स्टिंक बग के कुछ निम्फ पाए गए। हालांकि कहलगांव, पन्नूचक, मामलखा, तिनटंगा, गंगानगर, बुधूचक एवं शांति कॉलोनी सहित अन्य क्षेत्रों के बागानों में फिलहाल इस कीट का प्रकोप नहीं मिला है।

वैज्ञानिकों ने बताया कि वर्तमान में इसका प्रभाव सीमित और स्थानीय स्तर पर है, लेकिन यदि समय रहते निगरानी और नियंत्रण नहीं किया गया तो यह तेजी से फैल सकता है। इसलिए प्रारंभिक स्तर पर रोकथाम और सतत निगरानी बेहद जरूरी है।


बिहार कृषि विश्वविद्यालय के कुलपति ने कहा कि विश्वविद्यालय राष्ट्रीय अनुसंधान संस्थानों एवं राज्य उद्यानिकी विभाग के साथ समन्वय स्थापित कर स्थिति पर लगातार वैज्ञानिक निगरानी रख रहा है। उन्होंने कहा कि किसानों को जागरूक करना, त्वरित पहचान करना तथा समयबद्ध समेकित कीट प्रबंधन उपाय अपनाना बिहार की लीची उत्पादन प्रणाली और निर्यात क्षमता की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

उन्होंने आश्वस्त किया कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय, सबौर लीची उत्पादकों के हितों की रक्षा के लिए क्षेत्र विशेष के अनुरूप वैज्ञानिक सलाह और कीट प्रबंधन उपाय उपलब्ध कराता रहेगा।

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