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बंगाली और तांत्रिक पद्धति से होती है मां काली की पूजा; गंगा कटाव के कारण करीब 75 वर्ष पूर्व दियारा क्षेत्र से डिमाहा गांव में स्थापित किया गया था मंदिर

नवगछिया। गोपालपुर प्रखंड के गंगातट तटबंध पर स्थित दक्षिणेश्वरी डिमाहा वैष्णवी काली मंदिर क्षेत्र की आस्था और विश्वास का प्रमुख केंद्र है। यहां मां काली के दरबार में श्रद्धालुओं की अटूट आस्था देखने को मिलती है। स्थानीय मान्यता है कि सच्चे मन से मां का स्मरण करने वाले भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यही वजह है कि आसपास के गांवों के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु मां के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं।

इस मंदिर में करीब 200 वर्षों से मां काली की आराधना की परंपरा चली आ रही है। यहां बंगाली और तांत्रिक पद्धति से विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की जाती है। मंदिर की विशेषता यह है कि यह वैष्णवी काली मंदिर है, जहां बलि देने की परंपरा नहीं है। मां के विभिन्न स्वरूपों की विधिवत आराधना की जाती है।

गंगा कटाव के कारण दियारा क्षेत्र से डिमाहा गांव में स्थापित हुआ मंदिर

ग्रामीण अमित चौधरी ने बताया कि पहले दियारा क्षेत्र में मां का मंदिर फूस का बना हुआ था। गंगा नदी के भीषण कटाव के कारण करीब 75 वर्ष पूर्व मंदिर को वहां से हटाकर डिमाहा गांव में स्थापित किया गया। शुरुआती दौर में मंदिर का स्वरूप काफी छोटा था, लेकिन समय के साथ ग्रामीणों की आस्था और सहयोग से इसके विकास का प्रयास होता रहा।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2014 में नवगछिया शिव शक्ति योग पीठ के पीठाधीश्वर स्वामी आगमानंद जी महाराज के आगमन के बाद मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किया गया। उनके मार्गदर्शन में कई दिनों तक तांत्रिक विधि से पूजा-अर्चना हुई। इसके बाद ग्रामीणों के सहयोग से भव्य मंदिर निर्माण की नींव रखी गई। धीरे-धीरे मंदिर का स्वरूप विकसित हुआ और आज इसकी सुंदर बनावट श्रद्धालुओं को आकर्षित करती है।

मांगलिक कार्यों से पहले मां के दरबार में लगाते हैं हाजिरी

मंदिर के प्रति ग्रामीणों की आस्था का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि गांव में किसी भी मांगलिक कार्य की शुरुआत से पहले लोग मां की चौखट पर माथा टेकते हैं और आशीर्वाद लेते हैं। पूजा-पाठ और धार्मिक आयोजनों में ग्रामीणों की सक्रिय भागीदारी रहती है। प्रतिमा विसर्जन के दौरान गांव की बेटियां और दामाद भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह परंपरा गांव के लोगों के आपसी जुड़ाव और धार्मिक आस्था को दर्शाती है।

मंदिर में मेले का भी होता है आयोजन

मंदिर समिति के अध्यक्ष सह मुखिया प्रतिनिधि अजय चौधरी ने बताया कि मां वैष्णवी की कृपा से श्रद्धालुओं के कष्ट दूर होते हैं। मंदिर में पूजा-अर्चना के साथ विशेष अवसरों पर मेले का भी आयोजन किया जाता है, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु और ग्रामीण शामिल होते हैं।

करीब दो शताब्दियों से चली आ रही आराधना की यह परंपरा आज भी ग्रामीणों की श्रद्धा और सामूहिक सहयोग से आगे बढ़ रही है। दक्षिणेश्वरी डिमाहा वैष्णवी काली मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक विरासत और सामुदायिक एकता का भी प्रतीक बना हुआ है।

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