
@ दीवाली-छठ की दस्तक के बीच खाद्य सामग्रियों की कीमतों में अप्रत्याशित उछाल, अचानक प्रति किलो या लीटर 15 से 20 रुपये तक की बढ़ोतरी से आम आदमी परेशान।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। दीवाली और छठ का त्योहार जैसे-जैसे करीब आ रहा है, वैसे-वैसे आम आदमी की रसोई पर एक बार फिर महंगाई का शिकंजा कसता जा रहा है। त्योहारों की खुशियों पर महंगाई ने पानी फेरना शुरू कर दिया है। चीनी, सरसों तेल, अरहर दाल, चना दाल और खड़ा चना की कीमतों में पिछले दो-तीन महीनों के दौरान तीसरी बार अप्रत्याशित उछाल आने से आम परिवारों का बजट बिगड़ गया है। महंगाई की इस मार से राहत दिलाने के सरकारी दावे भी फिलहाल बेअसर नजर आ रहे हैं। नवरात्रि के बाद एक बार फिर किचन का बजट गड़बड़ाता दिख रहा है।

मंडी से मिल रही जानकारी के मुताबिक, खाद्य सामग्रियों की कीमतों में लगातार तेजी बनी हुई है। चीनी की कीमत में तीसरी बार बढ़ोतरी हो चुकी है, तो सरसों तेल के भाव 200 रुपये प्रति लीटर के पार पहुंच गए हैं। चीनी 65 रुपये किलो के पार बिक रही है, जबकि अरहर दाल 150 रुपये और चना दाल 100 रुपये किलो के पार पहुंच चुकी है। खड़ा चना भी महंगाई की इस दौड़ में पीछे नहीं है।
हर खरीदारी पर 20 रुपये का अतिरिक्त बोझ
मंडी के दुकानदारों के अनुसार, इन खाद्य सामग्रियों की कीमतों में अचानक 20 रुपये प्रति किलो या लीटर तक की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। इसका सीधा असर आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ रहा है। त्योहारों के मौसम में जहां घरों में पकवान और मिठाइयां बनाने की तैयारी होनी चाहिए, वहीं महंगे राशन ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

महंगाई ने फीकी की त्योहारों की मिठास
खाद्य पदार्थों की लगातार बढ़ती कीमतों ने गृहिणियों के सामने घर का बजट संभालने की चुनौती खड़ी कर दी है। गृहिणी संयुक्ता ठाकुर, नीलम विश्वकर्मा, जुली कुमारी, नीतू कुमारी कहती है खर्च में कटौती के लिए अब रसोई में भी समझौते होने लगे हैं। महंगी सब्जियों और दालों के बीच कहीं उबली सब्जियों से काम चलाया जा रहा है, तो कहीं दाल की जगह सब्जी-भात को तरजीह दी जा रही है।
चीनी के बढ़ते दाम ने चाय की मेहमाननवाजी तक पर असर डालना शुरू कर दिया है। गृहिणी जूली कहती है अब सहेलियों को चाय पर बुलाने से पहले भी खर्च का हिसाब लगाने को मजबूर हैं। चीनी की कीमत में उछाल के कारण मिठाइयां भी महंगी हो चुकी हैं। वहीं, दालों की बढ़ती कीमतों ने गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों की थाली से पौष्टिकता कम होने का खतरा पैदा कर दिया है। कई घरों के चूल्हों पर अब सिर्फ सब्जी-रोटी या सब्जी-भात ही बन रहा है।
सवाल यह है कि जब त्योहारों के ठीक पहले जरूरी खाद्य सामग्रियों के दाम इस तरह आसमान छूने लगें, तो आम आदमी दीवाली की खुशियां मनाए, महापर्व छठ में अपने सूप-डाला को पकवानों से सजाए या फिर रसोई का बजट बचाने की जद्दोजहद करे? आखिर कब तक महंगाई की मार आम लोगों की थाली और त्योहारों की खुशियों को फीका करती रहेगी?















