


@ सफाई में लगी एजेंसी को प्रति वर्ष करीब 6 करोड़ 92 लाख रुपये भुगतान के बाद भी हालात बदतर; सात दिनों से नहीं उठा कचरा, ‘कोढ़ में खाज’ बनी व्यवस्था।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। सफाई में लगी एजेंसी को प्रति वर्ष करीब 6 करोड़ 92 लाख रुपये का भुगतान करने के बाद भी ऊर्जा नगरी के नाम से पहचान रखने वाला कहलगांव इस बाढ़-बरसात के मौसम में मानो ‘कूड़ा नगरी’ बनने की प्रतियोगिता में उतर आया है। व्यवस्था की हालत ‘कोढ़ में खाज’ जैसी हो चुकी है। यहां कूड़े का ढेर बढ़ रहा है और जिम्मेदारों की चिंता घटती जा रही है। पिछले सात दिनों से नगर पंचायत के 17 वार्डों से कूड़े का उठाव नहीं हुआ है। सड़ांध से परेशान राहगीरों को उल्टियां होने लगी हैं। गृहस्वामी बीमार पड़ने लगे हैं। नतीजा यह कि शहर की सड़कें अब आवागमन के साथ-साथ कचरे के स्थायी प्रदर्शन की भी गवाह बन रही हैं। वहीं, कूड़े से उठने वाली बदबू से परेशान कुछ लोग अपना घर छोड़कर भागने को मजबूर हैं।
डंपिंग ग्राउंड का अभाव नगर पंचायत के लिए ऐसी पहेली बन गया है, जिसका हल निकालने के बजाय कूड़ा इधर-उधर पहुंचाने की कवायद चल रही है। शहर से दूर अनादीपुर की ओर एनएच-80 पर खाली जमीन पर कथित रूप से कचरा डंप किया जा रहा है। ग्रामीणों के विरोध के बावजूद अब तक कोई स्थायी वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो सकी है। यानी कचरा भी परेशान, शहरवासी भी परेशान और व्यवस्था भी मानो ‘आराम फरमा’ रही है।

मुख्य बाजार, रेलवे स्टेशन चौक, पोस्ट ऑफिस रोड, ओल्ड अस्पताल रोड, पुरानी बाजार, मारवाड़ी टोला, श्याम मंदिर, चौधरी टोला, थाना रोड और राजघाट रोड समेत शहर के कई इलाकों में कचरे का अंबार लग चुका है। बरसात ने इस कचरे की ‘सेवा’ कर उसकी सड़न और दुर्गंध को और प्रभावशाली बना दिया है। आवारा पशु कचरे को सड़क पर फैलाकर सफाई अभियान में अपना योगदान दे रहे हैं।
ऐसे में नगर पंचायत का स्वास्थ्य सर्वेक्षण 2026 भी इस व्यवस्था को देखकर शायद सोच रहा होगा कि सर्वेक्षण करे या खुद ही ‘पास’ होने की प्रार्थना करे।
डंपिंग ग्राउंड नहीं तो कचरा जहां जगह मिले, वहीं सही! जानकारी के अनुसार, नपं प्रशासन की ओर से फिलहाल जहां खाली और सूखी जगह मिले, वहीं कचरा डंप करने की बात कही गई है। बाढ़ का पानी घटने तक इंतजार करने को भी कहा गया है। इस निर्देश के बाद सफाई पदाधिकारी और कर्मचारी भी उहापोह में हैं कि कूड़ा उठाएं तो आखिर रखें कहां?
बिजली यादव ने कहा कि नपं प्रशासन को अपने डंपिंग ग्राउंड को अतिक्रमणमुक्त कराकर जल्द वैकल्पिक व्यवस्था करनी चाहिए। छोटू पांडे कहते हैं सफाई एजेंसी के भुगतान राशि में लूट मची है। इस लूट में बड़ी हिस्सेदारी जेब में जाती है। 28 दिनों तक काम और भुगतान तीस दिनों का होता है। यह चोरी नहीं डकैती है।
समाधान का इंतजार, जिम्मेदारों की चुप्पी बरकरार:
इस पूरे मामले में सबसे दिलचस्प बात यह है कि समस्या सड़क पर साफ दिखाई दे रही है, दुर्गंध नाक तक पहुंच रही है, लेकिन समाधान अब भी फाइलों और निर्देशों के बीच कहीं दिखाई नहीं दे रहा। शहरवासी कूड़े के ढेर के बीच व्यवस्था की ‘सफाई’ का इंतजार कर रहे हैं।
एसडीएम राकेश रंजन ने बताया कि यदि नगर पंचायत सरकारी जमीन की मांग करती है तो सीओ को निर्देशित किया जा सकता है। रैयती जमीन का भी प्रावधान है, लेकिन यह प्रक्रिया दस दिन बाद ही संभव हो सकेगी।
फिलहाल कहलगांव के लोगों के सामने सवाल यही है – कचरा सात दिन से सड़क पर है, दुर्गंध हर दिन बढ़ रही है, बीमारी का खतरा सामने है, लेकिन समाधान के लिए अभी ‘दस दिन’ और क्यों? आखिर ऊर्जा नगरी को कूड़ा नगरी बनने से रोकने के लिए व्यवस्था कब जागेगी?

















