


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। विक्रमशिला सेतु की बदहाल व्यवस्था के बीच एक ऐसा सवाल खड़ा हो गया है, जिसका जवाब अब जनता मांग रही है – अगर बेली ब्रिज महज कुछ महीनों की जरूरत के लिए था, तो इस पर करोड़ों रुपये क्यों खर्च किए गए और अब पुनर्स्थापना के नाम पर फिर करोड़ों रुपये क्यों खर्च हो रहे हैं?
प्राप्त जानकारी के अनुसार, विक्रमशिला सेतु के पुनर्निर्माण और स्थायी मरम्मत कार्य पर करीब 99 करोड़ रुपये खर्च किए जा रहे हैं। वहीं विस्तृत परियोजना एवं कैबिनेट से स्वीकृत कुल पैकेज की राशि करीब 126.26 करोड़ रुपये बताई जा रही है। ऐसे में निर्माण, अस्थायी व्यवस्था और पुनर्स्थापना पर होने वाले खर्च ने सरकारी धन के इस्तेमाल को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बताया गया है कि BRO (सीमा सड़क संगठन) द्वारा विक्रमशिला सेतु पर करीब 28 करोड़ रुपये की लागत से बेली ब्रिज का निर्माण कराया गया। यह बेली ब्रिज 7 जून 2026 को तैयार हुआ और छोटे वाहनों के परिचालन के लिए खोला गया था।
अब सवाल यह है कि जिस बेली ब्रिज पर करीब 28 करोड़ रुपये खर्च हुए, उसका वास्तविक उपयोग कितने दिनों तक हुआ? उपलब्ध जानकारी के मुताबिक करीब 115 दिनों के बाद अब इसके पुनर्स्थापना/हटाने की प्रक्रिया को लेकर भी खर्च सामने आ रहा है। यानी जनता के सामने सीधा हिसाब है – 28 करोड़ रुपये की लागत, करीब 115 दिनों का उपयोग और उसके बाद पुनर्स्थापना का अलग खर्च।

इसे लेकर क्षेत्र में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या योजना बनाते समय दीर्घकालिक उपयोग, लागत और वैकल्पिक व्यवस्थाओं का पर्याप्त आकलन किया गया था? अगर बेली ब्रिज अस्थायी समाधान था, तो उसकी लागत और उपयोगिता का सार्वजनिक हिसाब-किताब सामने क्यों नहीं रखा जा रहा।महीने भर की सुविधा के लिए साढ़े 26 लाख रोज। बेली ब्रिज की लागत और उपयोग अवधि को लेकर राजनीतिक बयानबाजी भी तेज हो गई है।
जनता पूछ रही है – जवाब देगा कौन:
मामला सिर्फ 28 करोड़ रुपये के बेली ब्रिज तक सीमित नहीं है। विक्रमशिला सेतु के स्थायी पुनर्निर्माण और मरम्मत पर भी करीब 99 करोड़ रुपये तथा स्वीकृत पैकेज के स्तर पर करीब 126.26 करोड़ रुपये की राशि का उल्लेख सामने आ रहा है।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि एक ही पुल के लिए अस्थायी व्यवस्था, स्थायी मरम्मत और फिर अस्थायी ढांचे की पुनर्स्थापना – आखिर कुल वित्तीय बोझ कितना पड़ेगा। जनता को अब भाषण नहीं, पूरा हिसाब चाहिए। कितने रुपये स्वीकृत हुए।कितने रुपये खर्च हुए। बेली ब्रिज बनाने में वास्तविक लागत कितनी आई। 115 दिनों में इसका कितना उपयोग हुआ। पुनर्स्थापना पर कितना खर्च होगा और इन तमाम खर्चों की जिम्मेदारी और जवाबदेही किसकी है।
विक्रमशिला सेतु सिर्फ एक पुल नहीं, भागलपुर और आसपास के लाखों लोगों की जीवनरेखा है। इसलिए इस पर खर्च होने वाले एक-एक रुपये का सार्वजनिक और पारदर्शी हिसाब सामने आना चाहिए। अब सवाल बड़ा है – 28 करोड़ का बेली ब्रिज, 115 दिनों का सफर और फिर करोड़ों की कवायद… आखिर सरकारी धन के इस्तेमाल की यह कहानी क्या कहती है?

















