
मिथिलांचल की पारंपरिक पूजा-पद्धति, अरिपन, विशेष भोग, खोइंछ भरने की रस्म और गोसाउनिक गीतों के साथ होगी माता की आराधना
पूर्णिया। महानंदा कॉलोनी स्थित शिव मंदिर प्रांगण में इस वर्ष मां भगवती की पूजा मिथिला के पारंपरिक विधि-विधान के अनुसार की जाएगी। मंदिर के प्रबंधक बाबा विश्व दर्शन ने इसकी जानकारी देते हुए बताया कि पूजा के दौरान मिथिलांचल की प्राचीन धार्मिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक मान्यताओं का विशेष ध्यान रखा जाएगा।
उन्होंने बताया कि मिथिलांचल में कुलदेवी भगवती, जिन्हें गोसाउनिक के नाम से भी जाना जाता है, की पूजा का विशेष महत्व है। दुर्गापूजा, विवाह और अन्य शुभ अवसरों पर सुख-समृद्धि एवं मंगलकामना के लिए माता की विशेष आराधना की जाती है। मिथिला की इस विशिष्ट पूजा-पद्धति में वैदिक और आगमिक परंपराओं का समन्वय देखने को मिलता है।

अरिपन और पारंपरिक पूजन सामग्री का विशेष महत्व
मिथिला विधि-विधान के अनुसार, पूजा स्थल पर चावल के घोल और सिंदूर से पारंपरिक अरिपन बनाया जाता है। माता के शृंगार के लिए लाल चुनरी, सिंदूर, टिकुली, आलता, चूड़ियां और अन्य पूजन सामग्री का उपयोग किया जाता है। वहीं, लाल गुड़हल के फूल, अक्षत, पान, सुपारी, बतासा, नारियल और मौसमी फलों को पूजा में विशेष स्थान दिया जाता है।
कलश स्थापना से शुरू होगा अनुष्ठान
मिथिला परंपरा में कलश स्थापना के साथ पूजा-अनुष्ठान का शुभारंभ किया जाता है। कलश में पवित्र जल, चंदन, सुपारी और परंपरा के अनुसार अन्य पूजन सामग्री रखी जाती है। इसके बाद वरुण देवता का पूजन और मंत्रोच्चार के साथ मां भगवती का आवाहन किया जाता है।
माता के समक्ष विशेष मंत्रों के साथ ध्यान और पूजा की जाती है। इसके बाद जल, चंदन, अक्षत, वस्त्र और शृंगार सामग्री अर्पित कर धूप-दीप जलाया जाता है। पारंपरिक मान्यताओं के अनुसार, लाल गुड़हल के फूलों से माता का शृंगार भी किया जाता है।
32 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा
मिथिलांचल में मां भगवती को 32 प्रकार के व्यंजनों का भोग लगाने की परंपरा प्रचलित है। श्रद्धालु अपनी सामर्थ्य के अनुसार विभिन्न पकवान, खीर, भीगा हुआ चना, बतासा, नारियल और मौसमी फल अर्पित करते हैं। पारंपरिक विधि में केले के पत्ते पर भोग सजाकर माता को समर्पित करने का भी महत्व है।
खोइंछ भरने की रस्म का विशेष महत्व

मिथिला की भगवती पूजा में खोइंछ भरने की परंपरा को विशेष महत्व दिया जाता है। इस रस्म में महिलाएं लाल कपड़े या चुनरी में अक्षत, साबुत हल्दी, पान, सुपारी, मखाना, बतासा, नारियल और दक्षिणा रखकर माता के चरणों में अर्पित करती हैं। इसे सुख-समृद्धि, सौभाग्य और परिवार के मंगल की कामना से जुड़ी पारंपरिक रस्म माना जाता है।
गोसाउनिक गीतों के साथ होगी आरती
पूजा के समापन पर कपूर और घी के दीपक से मां भगवती की आरती उतारी जाएगी। इस दौरान मिथिला के पारंपरिक गोसाउनिक गीतों का गायन किया जाएगा। इन गीतों में माता के प्रति श्रद्धा, भक्ति और मिथिलांचल की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत की झलक मिलती है।
मंदिर प्रबंधक बाबा विश्व दर्शन ने बताया कि मिथिला विधि-विधान से मां भगवती की पूजा आयोजित करने का उद्देश्य धार्मिक परंपराओं को संरक्षित करना और नई पीढ़ी को अपनी सांस्कृतिक विरासत से जोड़ना है। इस आयोजन के माध्यम से श्रद्धालुओं को मिथिलांचल की विशिष्ट पूजा-पद्धति और लोकपरंपराओं को करीब से जानने का अवसर मिलेगा।















