
खुशियों के फूल खिलाती हैं श्यामपुर वाली महारानी
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। जिले के कहलगांव शहर से सटे श्यामपुर की वैष्णवी दुर्गा महारानी जमकर अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं।पल में माताओं की सुनी कोख मातारानी भरती है। भक्तों की अन्य मुराद भी पूरी करती है।भक्तों को यहां प्रतिमा के निर्माण का खर्च वहन करने में इन्तजार की लंबी सीढ़ी से वर्षों गुजरना पढता है। दुर्गा पूजा समिति के अध्यक्ष बंटी पांडे, सचिव अमितेश कुमार साह, सौरभ कुमार, नीलमणि, मनीष, अभिषेक, अमर बताते हैं कि आगामी 2030 ई तक प्रतिमा दाता की सूचि क्रमवार तैयार हो चुकी है। इस बार स्व धर्मेंद्र साह के पुत्र अंशु कुमार ने प्रतिमा निर्माण कराया है। लॉटरी सिस्टम से गत 2015 ई में आगामी 15 वर्षों यानी 2030 तक के लिए प्रतिमा दाताओं का नाम तय हो चुका है। मुराद पूरी होने के बाद इस वर्ष भक्त दुलालचंद्र मुखर्जी के द्वारा प्रतिमा निर्माण का खर्च निर्वहन किया गया है। चार दिवसीय मेले में स्टेट लेवल की कुश्ती इस बार आकर्षण का केंद्र रहेगी।

स्व कंचन सिंह ने पूजा की
शुरुआत 1808 ई में की थी :
श्यामपुर पंचायत के मुखिया ब्रजेश पासवान, पूर्व मुखिया रणवीर सिंह, पूर्व जिप सदस्य शर्मिला देवी ने बताया कि श्यामपुर गांव निवासी स्व कंचन सिंह (राजपूत) परिवार ने 1808 ई में मां की पुआल की मुर्ती बनाकर पूजा की शुरुआत की थी। कहते हैं माता रानी ने सपने में आकर कंचन सिंह की मुराद पूरी की थी। उक्त समय माता रानी की पूजा – अर्चना दूर – दूर तक नहीं होती थी। श्यामपुर जंगल से पटा पड़ा था। घर – द्वार का कहीं नामो – निशान नहीं हुआ करता था. मातारानी की कृपा से ही अब श्यामपुर पंचायत का चप्पा – चप्पा गुलजार हो चुका है। फिलहाल, कंचन सिंह का परिवार आज कहां है गांव वाले को पता नहीं है। गांव से जाते – जाते कंचन सिंह ने मंदिर के नाम अपनी पूरी सम्पति दान कर दूर चले गये। आज भी मां की पूजा के साथ – साथ स्व कंचन सिंह के कुल देवी की पूजा – अर्चना होती है। जन सहयोग से आज मंदिर का स्वरुप भवन का रूप धारण कर चुका है।
सुनी गोद भरती मां :
श्यामपुर गांव व आसपास के इलाके के दर्जनों भक्तों ने बताया कि श्यामपुर की दुर्गा महारानी दर्जनों मां की सुनी कोख भर चुकी है। हर दिन दूर – दूर से कोख की मुराद लेकर माताएं आती है और अपनी उदास व शून्य आंखों से मां के दर्शन के पश्चात विनती कर घर वापस जाती है। कहते हैं इस विनती, आराधना का फल मिलने में देर नहीं लगती। मुराद पूरी होने पर अपने बच्चे का मुंडन नवरात्रा में मां के दरबार में ही कराती है। कहते हैं पूर्व में बलि प्रथा भी थी। जो आगे चलकर बंद कर दी गई। नवरात्रा में भव्य मेला लगता है।कई दिनों तक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की धूम रहती है। जिले से आए बच्चों के कई डांस व डांडिया ग्रुप यहां के सांस्कृतिक कार्यक्रम में हिस्सा लेते हैं और शील्ड सहित नगद उपहार लेकर जाते हैं। सप्तमी पूजा से ही मेले में ग्रामीणों की भीड़ उमड़ पड़ती है।
















