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@ भागलपुर जिले में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (GIS) अध्ययनों के अनुसार कुल दियारा क्षेत्र लगभग 1073.04 वर्ग किलोमीटर है। भौगोलिक बनावट और मिट्टी की उम्र के आधार पर इसे दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है।पुरानी दियारा भूमि (Old Diara Land), यह लगभग 203.26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है, जो मुख्य रूप से जिले के 6 ब्लॉकों के अंतर्गत आती है।नई दियारा भूमि (New Diara Land)। यह लगभग 869.78 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है।

प्रदीप विद्रोही

भागलपुर। गंगा और कोसी की बाढ़ तथा कटाव के बाद जब नदियों की मुख्य धारा अपने निर्धारित मार्ग की ओर लौटने लगी है, तो दियारा क्षेत्र की गंग बरार की जमीन पर किसानों ने खेती की तैयारी शुरू कर दी है। इसी कड़ी में गंगा और कोसी के तटीय इलाकों में बड़े पैमाने पर होने वाली परवल की खेती ने भी दस्तक दे दी है। भागलपुरी परवल के स्वाद का देश भर में चर्चा है। दियारा की रेतीली और उपजाऊ मिट्टी में परवल की लत्ती लगाने के लिए कोड़नी का काम शुरू हो गया है। किसान खेत तैयार करने के लिए मजदूरों को काम पर लगा रहे हैं।


भागलपुर जिले में रिमोट सेंसिंग और जीआईएस (GIS) अध्ययनों के अनुसार कुल दियारा क्षेत्र लगभग 1073.04 वर्ग किलोमीटर है। भौगोलिक बनावट और मिट्टी की उम्र के आधार पर इसे दो मुख्य श्रेणियों में विभाजित किया गया है। पुरानी दियारा भूमि (Old Diara Land), यह लगभग 203.26 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैली है, जो मुख्य रूप से जिले के 6 ब्लॉकों के अंतर्गत आती है।नई दियारा भूमि (New Diara Land)। यह लगभग 869.78 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत है, जो जिले के 13 ब्लॉकों को कवर करती है। दियारा के इन इलाकों में परवल की खेती कहां – कहां होती है इसका सही आंकलन सरकार के पास भी उपलब्ध नहीं है।

हर साल बाढ़ के कारण प्रभावित होने वाली दियारा की खेती में परवल किसानों के लिए महत्वपूर्ण फसलों में शामिल है। खेतों की सफाई, मिट्टी की कोड़नी और परवल की लत्ती लगाने की तैयारी के साथ दियारा में कृषि गतिविधियों ने रफ्तार पकड़नी शुरू कर दी है। दियारा में खेती का समय काफी महत्वपूर्ण होता है। नदी के जलस्तर में उतार-चढ़ाव और जमीन की उपलब्धता के आधार पर किसान फसल लगाने का निर्णय लेते हैं।

गंगा और कोसी के तटीय क्षेत्रों में परवल की खेती लंबे समय से किसानों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार रही है। यहां की मिट्टी और प्राकृतिक परिस्थितियां परवल की खेती के लिए अनुकूल मानी जाती हैं। बाढ़ का पानी उतरने के बाद जमीन में बची नमी और रेतीली दोमट मिट्टी फसल की शुरुआती बढ़वार में मदद कर सकती है, बशर्ते खेत में जलनिकासी की उचित व्यवस्था हो।

परवल की खेती में बीज के बजाय पुरानी लताओं के टुकड़ों या रोपण सामग्री का इस्तेमाल भी किया जाता है। इसलिए किसानों को लत्ती जुटाने, खेत तैयार करने और रोपाई की व्यवस्था पहले से करनी पड़ती है। खेत में कोड़नी शुरू होना इस बात का संकेत है कि दियारा क्षेत्र में परवल की खेती का नया चक्र शुरू हो रहा है। किसानों के लिए समय पर लत्ती लगाना, पौधों की देखभाल करना और खेत में पानी का उचित प्रबंधन करना महत्वपूर्ण होता है। इसके बाद फसल की बढ़वार और मौसम की परिस्थितियों के अनुसार उत्पादन पर असर पड़ता है।

बिहार में गंगा के किनारे बसे अनेक दियारा क्षेत्रों में परवल की खेती की जाती है। भागलपुर, कटिहार, बेगूसराय, पटना, वैशाली और आसपास के नदी तटीय इलाकों में किसानों की आजीविका में दियारा की खेती की अहम भूमिका है। इन क्षेत्रों में परवल के साथ तरबूज, खरबूज, ककड़ी, खीरा, कद्दू, करेला, कलाई, मकई, और दूसरी मौसमी फसलें भी उगाई जाती हैं। कटिहार जिले के गंगा दियारा क्षेत्र में भी नदी के किनारे स्थित कई मौजों की जमीन पर मौसमी खेती की जाती है। हालांकि, प्रत्येक वर्ष बाढ़, कटाव और नदी की धारा में बदलाव के कारण खेती का क्षेत्र घटता-बढ़ता रहता है।
दियारा में खेती की एक विशेषता यह भी है कि यहां जमीन की उपलब्धता स्थायी नहीं होती। नदी के कटाव से कुछ जमीन खत्म हो जाती है, जबकि दूसरी जगहों पर नई जमीन उभर आती है। इसी कारण खेती का क्षेत्रफल और फसलों का रकबा हर साल बदल सकता है। सहरसा, सुपौल, मधेपुरा और आसपास के इलाकों में नदी की प्रकृति के कारण कृषि कार्यों में कई तरह की चुनौतियां रहती हैं। इसके बावजूद किसान उपलब्ध जमीन पर मौसमी फसलें लगाकर अपनी आय बढ़ाने की कोशिश करते हैं।परवल की खेती शुरू होने से दियारा क्षेत्र में कृषि मजदूरों के लिए भी काम के अवसर पैदा होते हैं। खेतों की कोड़नी, लत्ती लगाने, निराई-गुड़ाई और बाद में फसल की तुड़ाई जैसे कार्यों में मजदूरों की जरूरत पड़ती है।

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