
@ गांधी की आत्मकथा के अंगिका अनुवाद के लिए डॉ. मीता का नागरिक अभिनंदन।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। वरिष्ठ समाजसेवी एवं पूर्व जिला परिषद अध्यक्ष डॉ. शंभू दयाल खेतान ने कहा कि अंगिका के मान-सम्मान और अधिकार के लिए अब आंदोलन को तेज करने की जरूरत है। साहित्यकार पिछले 50 वर्षों से अंगिका के लिए संघर्ष कर रहे हैं। अब जन-जन को जोड़कर आंदोलन को धार देने की आवश्यकता है। गुरुवार को एक स्थानीय होटल में युग चेतना फाउंडेशन, अंग-जन-गण एवं अंगिका सभा फाउंडेशन की ओर से आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी की अध्यक्षता कर रहे थे। संगोष्ठी में अंगिका की उपेक्षा और उसके अधिकार को लेकर चर्चा हुई।

गांधी शांति प्रतिष्ठान केंद्र के अध्यक्ष प्रकाश चंद्र गुप्ता ने कहा कि युवाओं को अंगिका से जोड़ने के लिए व्यापक जन-जागरण अभियान चलाना होगा। अंगिका को रोजगार और आजीविका से जोड़ने की दिशा में भी प्रयास जरूरी है।वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. अमरेंद्र ने कहा कि बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल के कई क्षेत्रों में अंगिका बोली जाती है। इतनी व्यापक जन-स्वीकृति के बावजूद भाषा की उपेक्षा चिंता का विषय है।
इस अवसर पर डॉ. मनोज मीता का महात्मा गांधी की आत्मकथा का अंगिका में अनुवाद करने के लिए नागरिक अभिनंदन किया गया। डॉ. मीता ने कहा कि गांधी की आत्मकथा अब अंगिका में भी उपलब्ध है, जो अंगिका समाज के लिए गौरव की बात है।डॉ. सुधीर मंडल ने अंगिका के प्रचार-प्रसार और ग्रामीण क्षेत्रों के लोगों को जोड़ने पर जोर दिया। वहीं प्रसून लतांत ने अंगिका को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए संगठित आंदोलन की आवश्यकता बताई।

संगोष्ठी में दीपावली पर ‘एक दीया अंगिका के नाम’ जलाने का प्रस्ताव भी पारित किया गया। कार्यक्रम में शिवनंदन खेतान, लखन लाल पाठक, प्रो. डॉ. रतन कुमार मंडल और शिक्षाविद राजीवकांत मिश्र सहित अन्य लोग मौजूद थे।















