


प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। जिले में आई प्रलयंकारी बाढ़ ने जहां अपने पीछे तबाही और बेबसी की लंबी कहानी छोड़ी है, वहीं अब पानी उतरने के साथ ग्रामीण इलाकों में लोगों को रोजी-रोटी का एक अस्थायी सहारा भी मिल गया है। गंगा का जलस्तर धीरे-धीरे कम होने लगा है और पानी अपनी पुरानी धार की ओर लौट रहा है। बाढ़ का पानी पीछे हटने के साथ कोसी, गंडक से आई मछलियां खेत-खलिहानों और निचले इलाकों में बने जलजमाव में बड़ी संख्या में फंसी रह गई हैं। यही मछलियां अब ग्रामीणों और स्थानीय मछुआरों के लिए किसी सौगात से कम नहीं हैं। खास बात यह है कि इसके लिए ग्रामीणों को न तो बड़ी नाव की जरूरत पड़ रही है और न ही महंगे जाल की। कहीं झीना कपड़े के सहारे तो कहीं मच्छरदानी को ही जाल का रूप देकर लोग मछलियां पकड़ रहे हैं। सुबह से लेकर शाम तक बड़ी संख्या में ग्रामीण जलजमाव वाले इलाकों में मछली पकड़ते नजर आ रहे हैं।

मच्छरदानी बनी मछली पकड़ने का जाल:
बाढ़ प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों में मछली पकड़ने का देसी तरीका इन दिनों खासा कारगर साबित हो रहा है। ग्रामीण झीना कपड़ा और मच्छरदानी को चारों ओर से पकड़कर अथवा बांस के सहारे पानी में डालकर धीरे-धीरे आगे बढ़ते हैं। ठहरे पानी में मछलियों की अधिकता के कारण कुछ ही देर में मच्छरदानी में कई तरह की मछलियां फंस जाती हैं।ग्रामीणों का कहना है कि एक-दो घंटे की मेहनत के बाद ही पर्याप्त मात्रा में मछलियां मिल जाती हैं। इससे घर के भोजन की जरूरत पूरी हो जाती है और बची हुई मछलियों को स्थानीय बाजार में बेचकर कुछ नकद पैसे भी मिल जाते हैं। ऐसे समय में, जब बाढ़ के कारण बड़ी संख्या में परिवारों का रोजगार प्रभावित हुआ है, मछलियां ग्रामीणों के लिए आय का तत्काल साधन बन गई हैं।
दो जून की रोटी का सहारा बनी मछलियां:
बाढ़ की वजह से खेतों में कामकाज प्रभावित है। मजदूरी और दूसरे छोटे-मोटे रोजगार के अवसर भी सीमित हो गए हैं। कई परिवार अब भी बाढ़ के बाद की मुश्किल परिस्थितियों से जूझ रहे हैं। ऐसे में ठहरे पानी से मिलने वाली मछलियां उनके लिए भोजन और आमदनी, दोनों का जरिया बन रही हैं। पानी घटने के बाद जब छोटे गड्ढों, खेतों और निचले इलाकों में पानी ठहर जाता है तो उसमें बड़ी संख्या में मछलियां फंस जाती हैं। ग्रामीण इसी अवसर का लाभ उठा रहे हैं।
दिनभर जारी रहती है शिकारमाही:
गांवों में इन दिनों सुबह होते ही लोग मछली पकड़ने के लिए निकल पड़ते हैं। पुरुषों के साथ कई जगह महिलाएं और बच्चे भी ठहरे पानी के किनारे मछली पकड़ते दिखाई देते हैं। किसी के हाथ में बांस है तो कोई मच्छरदानी लेकर पानी में उतर जाता है। एक-दो घंटे में जब पर्याप्त मछलियां मिल जाती हैं तो उन्हें लेकर लोग अपने घर लौट आते हैं। कुछ परिवार मछलियों को घर में पकाकर खाते हैं, जबकि कुछ लोग अतिरिक्त मछलियों को ग्रामीण बाजार बेचकर जरूरी सामान खरीद रहे हैं।
बीमारी के खतरे की भी चर्चा:
हालांकि बाढ़ के पानी से मिलने वाली मछलियों को लेकर स्वास्थ्य संबंधी चिंता भी बनी हुई है। आम तौर पर बाढ़ का पानी कई तरह के प्रदूषित स्रोतों और गंदगी को अपने साथ बहाकर लाता है। ऐसे में लंबे समय तक ठहरे पानी में पली या फंसी मछलियों की स्वच्छता को लेकर ग्रामीणों के बीच आशंका बनी हुई है। बावजूद इसके आर्थिक मजबूरी के कारण गरीब परिवार मछलियां पकड़ने से परहेज नहीं कर रहे हैं। उनके सामने तत्काल भोजन और रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने की चुनौती है। बीमारियों की दस्तक यानी खतरे की आशंका को देखते हुए बिहार सरकार ने नेपाल से बाढ़ के साथ आई मछलियों के खाने पर पाबंदी लगा रखी है।
बाढ़ का दर्द अभी पूरी तरह खत्म नहीं:
गंगा का पानी भले ही अब शांत दिखाई दे रहा हो लेकिन बाढ़ का असर अभी ग्रामीणों की जिंदगी में साफ दिखाई दे रहा है। कई परिवारों के घर, खेत और रोजी-रोजगार बाढ़ से प्रभावित हुए हैं। बाढ़ पीड़ितों की स्थिति अभी भी खानाबदोश जैसी बनी हुई है।ऐसे में ठहरे हुए पानी से मिलने वाली मछलियां उनके लिए फिलहाल राहत का एक छोटा सा जरिया बन गई हैं। बाढ़ ने जिन ग्रामीणों से उनकी फसल और रोजगार छीना, उन्हीं जलजमाव वाले इलाकों में अब मछलियां उनके लिए दो जून की रोटी जुटाने में मददगार साबित हो रही हैं।जिले के ग्रामीण इलाकों में इन दिनों यही तस्वीर दिखाई दे रही है-एक ओर बाढ़ की तबाही के निशान हैं तो दूसरी ओर उसी बाढ़ के पीछे छूटे पानी में ग्रामीण अपने लिए जीवन और रोजी-रोटी तलाश रहे हैं।

















