
@ जनता अब भी किनारे खड़ी, जनहित में पथ निर्माण मंत्री ई. शैलेन्द्र एवं जिला प्रशासन से सीधा सवाल।महागठबंधन की नेत्री अर्पणा कुमारी ने एक बार फिर पथ निर्माण मंत्री ई. शैलेन्द्र के एक बयान के खिलाफ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर हल्ला बोल दिया है।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। विक्रमशिला सेतु बंद हुआ तो मंत्री की ओर से जनता को दिलासा मिला था कि, ‘चिंता मत कीजिए, गंगा में 12 जहाज चलेंगे, वह भी निःशुल्क!’ जनता ने भी भरोसा कर लिया। आखिर सरकार के एक मंत्री ने कहा था और प्रशासन ने भी भरोसा दिलाया था। लोगों ने सोचा – पुल बंद है तो क्या हुआ, सरकार ने नदी पर रास्ता खोल दिया है। लेकिन अब हालात देखकर लगता है कि सरकारी घोषणा में 12 जहाज हैं और जमीन पर जनता को उनके दर्शन का इंतजार! यानी हर दिन महज चार जहाज। कार्गो गंगा किनारे आराम फरमा रहा है।

जनहित में पथ निर्माण मंत्री ई. शैलेन्द्र एवं जिला प्रशासन से सीधा सवाल करते हुए महागठबंधन की नेत्री अर्पणा कुमारी ने एक बार फिर पथ निर्माण मंत्री ई. शैलेन्द्र के एक बयान के खिलाफ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर हल्ला बोल दिया है। साथ ही अर्पणा ने मंत्री के उक्त समय दिए बयान का वीडियो भी पोस्ट किया है।
अर्पणा ने तंज कसते हुए अपने पोस्ट में लिखा है कि दिनभर सीमित जहाजों के परिचालन से यात्रियों की परेशानी बढ़ रही है। नौकरीपेशा लोग समय पर ड्यूटी पहुंचने के लिए जूझ रहे हैं, दूध विक्रेताओं के सामने दूध खराब होने का संकट है, छोटे व्यापारी और केला विक्रेता अपनी रोजी-रोटी बचाने के लिए परेशान हैं और दैनिक यात्रियों के लिए हर दिन गंगा पार करना किसी सरकारी परीक्षा से कम नहीं है।
सरकार ने कहा था 12 जहाज, जनता पूछ रही है – गिनती कहां करें!
जनता का सवाल बिल्कुल साधारण है अगर मंत्री ने 12 जहाज जनता के लिए घोषित किए गए थे, तो सभी नियमित रूप से क्यों नहीं चल रहे हैं। क्या जहाजों का भी कोई ‘वर्क फ्रॉम होम’ चल रहा है।या फिर वे भी सरकारी फाइलों की तरह पहले कागज पर यात्रा करते हैं और उसके बाद कभी-कभार गंगा तक पहुंचते हैं और अगर सभी 12 जहाज उपलब्ध हैं, तो उनके परिचालन का स्पष्ट टाइमटेबल और वास्तविक स्थिति जनता के सामने रखने में परेशानी क्या है।

नौकरी जनता की, दूध जनता का, व्यापार जनता का… इंतजार भी जनता का!
जिस कर्मचारी की ड्यूटी छूट रही है, वह प्रेस विज्ञप्ति दिखाकर अपने बॉस को नहीं समझा सकता। कच्चे केले मंडी पहुंचने से पहले सफर में ही पक और सड़ जा रहे हैं । जिस दूध विक्रेता का दूध खराब हो रहा है, वह सरकारी आश्वासन को उबालकर बेच नहीं सकता। जिस छोटे व्यापारी की दुकान पर ग्राहक इंतजार करते-करते लौट रहा है, उसके लिए घोषणा कोई कारोबार नहीं है।और जिस दैनिक यात्री को रोज गंगा पार करनी है, उसके लिए ‘व्यवस्था की जा रही है’ कोई परिवहन साधन नहीं है।
अब मंत्री और जिला प्रशासन से जनता का सीधा सवाल:
घोषणा कितने जहाजों की हुई थी, वास्तव में कितने जहाज नियमित रूप से चल रहे हैं, किस समय चल रहे हैं, कितने यात्रियों को प्रतिदिन सुविधा मिल रही है। अतिरिक्त जहाज की जरूरत होने पर उसकी व्यवस्था क्या है। इन सवालों का जवाब जनता को चाहिए – नई घोषणा नहीं। मालवाहक जहाजों को अलग रखते हुए जनता के लिए घोषित सभी 12 निःशुल्क जहाज नियमित रूप से चलाए जाएं और एक अतिरिक्त जहाज को आपातकालीन सेवा के लिए सुरक्षित रखा जाए। क्योंकि विकास का असली टेस्ट रिबन काटने के मंच पर नहीं, बल्कि उस आम आदमी की यात्रा में होता है, जो रोज कमाकर अपना घर चलाता है। पुल बंद करना मजबूरी हो सकती है। व्यवस्था बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है। लेकिन व्यवस्था का इंतजार करवाते रहना जनता की नियति नहीं हो सकती।
अब गंगा की लहरें भी शायद यही पूछ रही होंगी – 12 जहाजों का वादा था, साहब… जनता को तैरकर जाना है या जहाज भी आएंगे। घोषणा की नाव बहुत दूर तक चल चुकी। अब जरूरत है – राहत की नाव को घाट से खोलने की।















