


@ घर-बार छोड़कर राहत केंद्रों में पहुंचे लोग, बच्चों से लेकर मवेशियों तक की चिंता; जहां मिली जगह, वहीं बना लिया आशियाना। चारे की व्यवस्था नदारद। कुल 25,923 पशु प्रभावित हैं।
प्रदीप विद्रोही
भागलपुर। बाढ़ का पानी जब घरों की चौखट पार कर अंदर तक पहुंच जाता है तो इंसान के सामने सिर्फ अपनी जान बचाने की चुनौती नहीं होती, बल्कि उन बेजुबानों की चिंता भी सताती है, जो वर्षों से परिवार का हिस्सा रहे हैं। यही वजह है कि इन दिनों बाढ़ राहत केंद्रों में एक ऐसा नजारा देखने को मिल रहा है, जो आपदा के बीच इंसान और जानवरों के बीच के रिश्ते को बयां करता है। राहत शिविरों में लोग अपने बच्चों, बुजुर्गों और जरूरी सामान के साथ पालतू जानवरों और मवेशियों को भी लेकर पहुंचे हैं।
बाढ़ ने सिर्फ इंसानों की राह नहीं रोकी है, पशुओं के लिए भी आफत बनकर आई है। जिले में करीब 4.74 लाख पशुओं की मौजूदगी सामने आई है। पिछले आंकड़ों के मुकाबले पशुधन की संख्या में करीब 23 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे में बाढ़ के दौरान पशुओं को सुरक्षित जगह तक पहुंचाना प्रशासन के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक जिले में 08 पशु चिकित्सा शिविर, 05 चलंत पशु चिकित्सा दल सक्रिय हैं तथा 1,846 पशुओं का उपचार किया गया है। प्रतिवेदन के अनुसार कुल 25,923 पशु प्रभावित हैं। प्रभावित इलाकों में पशुपालकों और पशुओं की सुरक्षा के लिए जरूरी इंतजाम किए गए हैं।
प्रशासन के अनुसार, 60 हजार प्रभावित पशुओं के लिए पशुपालन विभाग के 38 डॉक्टरों की टीम तैनात है। बड़े मवेशियों को 6 किलो और छोटे पशुओं को 3 किलो प्रतिदिन की दर से तीन दिन का चारा बांटने की बात कही गई है। हालांकि खरीक, सबौर, ममलखा, अकबरनगर और पीरपैंती के पशुपालकों की स्थिति इससे अलग है। अकबरनगर के हरिजन टोला और हरिनगर तथा खरीक के राहत शिविरों में मवेशियों के लिए सरकारी चारे की व्यवस्था नहीं मिली। बाढ़ पीड़ित 10 से 15 किलोमीटर दूर से साइकिल, ठेले और ई-रिक्शे से महंगे दामों पर भूसा लाने को मजबूर हैं। ममलखा के ग्रामीण मथुरापुर के सूखे इलाके से चारा खरीदकर रेल मार्ग से गांव पहुंचे।
पानी बढ़ने के साथ ही निचले इलाकों के कई परिवारों को अपना घर छोड़कर सुरक्षित स्थानों की ओर जाना पड़ा। जिन लोगों के पास गाय, भैंस, बकरी या अन्य मवेशी हैं, उनके लिए उन्हें पीछे छोड़ना आसान नहीं था। ऐसे में परिवार अपने साथ बेजुबानों को भी राहत केंद्र तक ले आए। शिविरों में कहीं परिवार के पास बंधी गाय नजर आती है तो कहीं रस्सी से बंधी बकरियां। कुछ लोग अपने पालतू कुत्तों को भी साथ लेकर पहुंचे हैं।
राहत केंद्रों में सीमित जगह के कारण कई परिवारों को इंसानों और जानवरों के लिए अलग-अलग व्यवस्था नहीं मिल पा रही है। जहां थोड़ी जगह मिली, वहीं परिवार ने अपना ठिकाना बना लिया। एक तरफ बच्चे और बुजुर्ग बैठे हैं तो पास में ही मवेशियों को बांध दिया गया है। कई परिवारों के लिए यह मजबूरी भी है और भावनात्मक जुड़ाव भी।
एक ग्रामीण ने बताया कि मवेशी उनके परिवार की पूंजी हैं। बाढ़ में घर और सामान का नुकसान हो सकता है, लेकिन यदि पशुओं को छोड़ दिया जाए तो उनके सामने चारा और सुरक्षा का संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए जोखिम उठाकर भी उन्हें साथ लाना पड़ा।
कई लोग आसपास के ऊंचे स्थानों और बचे हुए खेतों से घास काटकर ला रहे हैं। कुछ परिवारों का कहना है कि यदि पशुओं के लिए पर्याप्त चारा नहीं मिला तो उनकी परेशानी और बढ़ जाएगी। पशु बीमार न पड़ें, इसके लिए दवा और पशु चिकित्सकीय सुविधा की भी जरूरत महसूस की जा रही है।
बच्चों के लिए कौतूहल, परिवारों के लिए जिम्मेदारी:
राहत केंद्रों में जानवरों की मौजूदगी बच्चों के लिए कौतूहल का विषय भी बनी हुई है। बच्चे कभी बकरियों को देखते हैं तो कभी अपने पालतू कुत्तों के साथ समय बिताते नजर आते हैं। लेकिन परिवारों के लिए यह सिर्फ भावनात्मक रिश्ता नहीं, बल्कि जीवन-यापन से जुड़ा सवाल है। दूध देने वाले पशु कई परिवारों की आय का प्रमुख साधन हैं। ऐसे में उन्हें बचाना परिवार की आर्थिक सुरक्षा बचाने जैसा है।

बाढ़ राहत केंद्रों का यह दृश्य बताता है कि आपदा के समय इंसान सिर्फ अपने बारे में नहीं सोचता। जिन जानवरों के साथ परिवार वर्षों से रह रहा है, उन्हें संकट की घड़ी में अकेला छोड़ना उनके लिए संभव नहीं है। इसलिए एक ही शिविर में इंसान और जानवर साथ-साथ नजर आ रहे हैं।
राहत केंद्रों में मौजूद यह तस्वीर बाढ़ की भयावहता के साथ-साथ इंसान और बेजुबानों के बीच के भरोसे और अपनत्व की कहानी भी कह रही है। जहां एक ओर लोग अपने घर और सामान को पीछे छोड़ आए हैं, वहीं दूसरी ओर अपने पशुधन को सुरक्षित रखने की कोशिश में जुटे हैं।

















